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धर्म एवं संस्कृति विभाग
    घरमठशाक्य
    जमछेन ल्हाखङ यिगा छोसजिन

    जमछेन ल्हाखङ यिगा छोसजिन

    MONASTERY

    जमछेन ल्हाखङ यिगा छोसजिन— तिब्बत में रोङतोन शेजा कुनरिग ने सन् 1435 में ल्हासा के उत्तर छेपो श्रीनालन्दा नाम प्रथम विद्यापीठ स्थापित किया और इससे बौद्ध अध्ययन और साधना का विकास हुआ। निर्वासन में सन् १९८३ में महामन्त्र शासन-अधिपति चोग्येद ठ्रिछेन रिनपोछे ने बौद्धनाथ स्तूप समीप बाह्य और आन्तरिक आधार आधेय सहित मठ की स्थापना की। मठ में मुख्य पूजा आधार के रूप में ताम्र-स्वर्ण निर्मित बुद्ध मैत्रेय की एकमंजिला मूर्ति, स्वर्ण-ताम्र निर्मित बुद्ध-मूर्ति, एक तीर के आकार की बुद्ध प्रकाश देने वाले (दिपंकर) की मूर्ति, दोनों पार्श्वों में मञ्जूश्री और वज्रपाणि की मूर्तियां, साक्या, ङोरपा और छरपा के तीन गुरु, तीन दीर्घायु के देवता, कुनखेन रोङतोन, और २१ ताराओं की मृन्मयी मूर्तियाँ हैं। मठ की लाइब्रेरी में कग्यूर, तेनग्यूर, तन्त्रसंग्रह, साधना-संग्रह आदि सभी बौद्ध सम्प्रदायों के वचन स्थापित हैं। उसी प्रकार रिनपोछे ने नेपाल में टशी रबतेन लिङ की भी स्थापना की है। आज, गुह्यमन्त्र शासन अधिपति चोग्येद रिनपोछे, जेचुन कुनगा तेनडोन और सचिव व अन्य लामा टुलकु आदि कुल ९८ भिक्षु हैं। यहाँ छरपा परम्परा अनुसार विधि-अनुष्ठान, तोरमा-निर्माण आदि तथा अपनी परम्परा पर केन्द्रित होकर महाशास्त्रों का अध्ययन किया जाता है। इसके अतिरिक्त परम पावन दलाई लामा के लिए पूजा तथा अपनी परम्परा के गुरुओं के परिनिर्वाण दिवस, प्रत्येक दशमी में पूजा आदि निरन्तर आयोजित है।

    Trikal Maitreya Buddha Vihara, Jamchen Lhakhang Monastery, Bougha-6, G.P.O. Box No. 4518,, Kathmandu,

    , 4518

    एवम शेदडुब छोसखोर लिङ

    एवम शेदडुब छोसखोर लिङ

    MONASTERY

    एवम शेदडुब छोसखोरलिङ की स्थापना मनाली हिमाचल में गुरु नवाङ डगपा ने सन् १९७४ में की। बाद में इसे ङोर खंगसर ङवाङ खेनचे थुबतेन ञिङपो को समर्पित किया गया। आज लोबपोन ङवाङ छुलठ्रिम के मार्गदर्शन में स्पीति के ४८ भिक्षु हैं।

    Evam Shedup Chokhorling Sakya Monastery, Rangri, P.O. Manali, Distt. Kullu, , Manali

    , 176215

    चेछेन तेनपी गाछल शेदडुब छोसखोर लिङ

    चेछेन तेनपी गाछल शेदडुब छोसखोर लिङ

    MONASTERY

    चेछेन तेनपी गाछल शेदडुब छोसखोर लिङ की स्थापना खोनतोन कोनछोग ग्यालपो ने सन् १०७३ में तिब्बत के चङ के अन्तर्गत साक्या स्थान में की गयी थी। बाद में इसी स्थान के नाम से व्यक्ति को अभिहित किया गया और साक्या संप्रदाय विकसित हुआ। प्रारम्भ में दक्षिण और पश्चिम में दो मठ थे। दक्षिणी मठ साक्या डुम-नदी के दक्षिण पार्श्व में अवस्थित है और पश्चिमी मठ डुम-नदी के उत्तर पार्श्व वोनपो पर्वत में अवस्थित है। विशेषकर डोगोन छोसग्याल फगपा के शासन-काल में पोनछेन शाक्य जङपो ने सन् 1268 में साक्या ल्हाखङ छेनमो का नव-निर्माण किया और अध्ययन-अध्यापन व साधना का प्रकाश हर दिशाओं में व्याप्त हुआ। किन्तु सन् १९५९ में और विशेष रूप से सांस्कृतिक क्रांति के नाम पर चीन ने बडा विध्वंस किया और केवल नाम मात्र शेष रखा। वर्तमान में तिब्बती लोग इसका पुनरुद्धार कर रहे हैं। १९५९ में निर्वासन में सन् १९६४ में ४१वें साक्या गोङमा रिनपोछे ने राजपुर उत्तराखंड भारत में मठ की स्थापना की। तिब्बती, नेपाली, मोनपा, मंगोलियन, भूटानी, किन्नौरी आदि देश-विदेश से आये हुए २३७ भिक्षु हैं, जो अक्षुण्ण साक्या परंपरा का अध्ययन कर रहे हैं।

    Sakya Centre 187 Rajpur Road P.O. Rajpur 248 009 Distt. Dehra Dun (U.A.), Rajpur

    , 248 009

    केगोन चेछेन समडुब लिङ

    केगोन चेछेन समडुब लिङ

    MONASTERY

    केगोन चेछेन समडुब लिङ तिब्बत में खेनपो दगछेन आदि ने दानपति और गुरु के सम्बन्ध से केगु दोनडुब लिङ मठ स्थापित किया। तिब्बत पर चीन के आक्रमण से पूर्व यहाँ १२०० से अधिक संख्या में भिक्षु अध्ययन करते थे। भारत में ङोर फेनखङ खेन रिनपोछे ङवाङ खेडुब ग्याछो, ङोर लुदिङ खेन रिनपोछे जमग्याङ तेनपी ञिमा के विचार-विमर्श के फल स्वरूप गापा डहुर वोन और भाँजा पेमा दोनडुब ने दायित्व ग्रहण कर सन् 1966 में कमरऊ हिमाचल प्रदेश में मठ और भिक्षु आवास का नव-निर्माण किया। आज लामा वोनपो पूज्य ङवाङ थुबतेन छोसकी ञिमा की अध्यक्षता में लामा टुलकु सहित 51 भिक्षु अध्ययनरत हैं।

    JM3M+M95, Paonta - Hatkoti Rd, , Kamrau

    , 173029

    साक्या गुरु गुम्बा

    साक्या गुरु गुम्बा

    MONASTERY

    साक्य गुरु गुम्बा की स्थापना सन् १९०९ में अमडो लामा द्वारा स्थानीय समुदाय संघ के सहयोग से दार्जिलिंग में स्थापित किया गया था। १९५९ में चीन के तिब्बत पर कब्जे के बाद साक्या गोङमा दगठ्री रिनपोछे इसी मठ में रहे। यह मठ निर्वासन में प्रथम साक्या मठ रहा और उस समय मठ में ९० भिक्षु थे। साक्या गोङमा दगठ्री रिनपोछे के निर्देश अनुसार खेनपो सङगे तेनजिन को मठ के उपाध्याय नियुक्त किया गया था। बुद्धशासन के तीन वस्तुओं— उपोषध, वर्षावास व प्रवारणा का अभ्यास आज तक होता रहा है। सन् १९७९ से यह मठ साक्या गोङमा रिनपोछे के नाम से राज्य सरकार में पंजीकृत है।

    Hill Cart Rd, Ghoom, ,

    , 734102

    पाल साक्या मातृ-विहार थुबतेन नगग्याल लिङ

    पाल साक्या मातृ-विहार थुबतेन नगग्याल लिङ

    MONASTERY

    पाल साक्या मातृ-विहार थुबतेन नगग्याल लिङ की स्थापना साक्या गोङमा दगठ्री रिनपोछे ने सन् १८८१ में पुरवाला, देहरादुन में की। इसका उद्देश्य बुद्ध-धर्म का अध्ययन-अध्यापन, विशेषकर साक्या परंपरा और पूर्ववर्ती विद्वानों से परम्परा रूप से गत सूत्र, मन्त्र और टीकाओं की कुशल अध्ययन प्रणाली का संरक्षण संवर्धन करना है। मठ का मुख्य पूजा-आधार कांस्य-स्वर्ण निर्मित बुद्ध-प्रतिमा है। इसके लिए पूज्य वज्रधर और पूज्य लुदिङ खेन रिनपोछे ने धारणी-साधना की है। मठ के हार्दिक निमन्त्रण पर सन् १९८२ में परम पावन दलाई लामा का आगमन हुआ और यहाँ एक सप्ताह प्रवास में रहते हुए बड़ी संख्या में उपस्थित भक्त जनों को प्रवचन दिया तथा साक्या मागोन (मातृ-विहार) की सु-स्थापना के लिए हार्दिक साधुवाद प्रदान किया। तिब्बत के महान् बौद्ध-विहारों की अध्ययन-परिपाटी अनुसार यहाँ प्रमाणशास्त्र, प्रज्ञापारमिता अभिसयमालंकार, मध्यमक-शास्त्र, विनय, अभिधर्म आदि अठारह महाशास्त्रों को यहाँ मूल विषय में रखा गया है। इसके अतिरिक्त, तिब्बती व्याकरण, काव्य, इतिहास और अंग्रेजी के साथ-साथ कई आधुनिक संबंधित विषयों भी सिखाए जाते हैं। खेनपो रिनछेन, खेनपो ग्याछो, खेनपो जमयङ शेरब आदि व्याख्यान, वाद-विवाद और रचना के माध्यम से शिष्यों का पालन-पोषण कर अपनी चित्त-सन्तति को परिपक्व करते हैं। सन् १९८१ से २००५ तक यहाँ से कचूपा उपाधि प्राप्त करने वाले ६८ भिक्षु और आचार्य उपाधि प्राप्त करने वाले ३३ हुए। वे सभी अपनी शिक्षा-दीक्षा सम्पूर्ण कर भारत, नेपाल, तिब्बत में विभिन्न विहारों व संस्थानों में सेवा कर रहे हैं। वर्तमान में यहाँ विभिन्न क्षेत्रों जैसे तिब्बत, लद्दाख, मंगोल, भूटान, नेपाल और भारत से ६२ भिक्षु हैं।

    Sakya Magon Shedra Thubten Namgyal Ling, GM3W+VG6, Puruwala, Puruwala,

    Himachal Pradesh, 173025

    साक्या विद्यालय

    साक्या विद्यालय

    MONASTERY

    साक्या विद्यालय की स्थापना सन् २०१५ में देहरादून में स्थित देकीलिङ तिब्बती बस्ती में साक्या गोङमा के ४१वें पीठाधीश ने की। २०१७ में निर्माणकार्य सम्पन्न हो गया यह साक्या कॉलेज का शाखाभूत विद्यालय है। यहाँ बाल भिक्षुओं को आधनिक शिक्षा प्रदान करने के मुख्य उद्देश्य से स्थापित है। यह बौद्ध महाविद्यालयों से सम्बद्ध प्रारम्भिक विद्यालय है। अत एव सभी छात्र बाल-भिक्षु हैं। प्रारम्भ में यहाँ 50 छात्र थे। यहाँ कर्मचारी, प्रधानाचार्य, शिक्षक, स्वास्थ्य-कर्मी, भोजन-प्रबन्धक, रसोई आदि से यह सुविधा सम्पन्न है। पाठ्यक्रम के तिब्बती, अंग्रेजी, चीनी, हिंदी, गणित, धार्मिक इतिहास, और पूजा-पाठ अनुष्ठान शामिल है। ९वीं कक्षा उत्तीर्ण भिक्षु साक्य कॉलेज आदि महाविद्यालयों में प्रवेश कर बौद्ध विद्या का सम्पूर्ण रूप में अध्ययन करने का अवसर प्राप्त कर सकते हैं। स्कूल में भिक्षुओं की आयु ५ से १५ वर्ष है। यहाँ विद्यालय १२० छात्रों को समायोजित करने की क्षमता रखता है। शिक्षण, भोजन व आवास निःशुल्क है। आज इस विद्यालय में १०० भिक्षु हैं और वे ६वीं कक्षा तक की कक्षाएँ चल रही हैं।

    Sachen School, Dekyiling Tibetan Settlement, Dehradun

    Uttarakhand, 248013

    साक्या पेमा छल इन्स्टिट्यूट

    साक्या पेमा छल इन्स्टिट्यूट

    MONASTERY

    साक्या पेमा छल इन्स्टिट्यूट नेपाल के पोखरा में अवस्थित है। १३ मार्च, १९९९ को अर्थात् महान् सिद्ध आचार्य साक्या पण्डित के जन्म-जयन्ती के सु-अवसर पर इस विद्या-केन्द्र का उद्घाटन पूज्य चोग्येद ठ्रिछेन रिनपोछे के कर-कमलों से हुआ है। इस मठ के मुख्य संस्थापक खेनपो कुनगा दोनडुब और अमेरिका-निवासी खेनपो पेमा वाङडाक हैं। संस्थापक द्वय के समर्पण और दृढ़ संकल्प के कारण यह मठ समाज में एक अद्वितीय विद्या-केन्द्र बन गया है। इस मठ की स्थापना का मुख्य उद्देश्य अद्वितीय तिब्बती बौद्ध शिक्षाएँ, संस्कृति और नैतिक परंपराएँ संरक्षित करना और उनका प्रवर्धन करना है।। इस मठ के अधिकतर भिक्षु नेपाल के हिमालयी क्षेत्रों मुस्ताङ के निवासी नेपाली और तिब्बती हैं। यहाँ ज्यादातर छात्र निर्धन व वञ्चित परिवार के हैं। मठ की शिक्षा प्रणाली भौतिकतावाद व आधुनिक चकाचौंध से मुक्त है तथा प्राचीन और आधुनिक शिक्षा पद्धति दोनों का समावेश कर बनी है। वर्तमान में लगभग २५ कर्मचारी और १२० भिक्षु छात्र हैं। मठ में प्राथमिक विद्यालय और उच्च बौद्ध अध्ययन दोनों हैं। उनमें प्राथमिक विद्यालय में ८ वीं कक्षा तक का अध्ययन किया जाता है। इसमें मुख्य विषय अंग्रेजी, तिब्बती और नेपाली भाषा, गणित, विज्ञान, स्वास्थ्य, सामाजिक अध्ययन और साक्या परंपरा के अनुष्ठान और अभ्यास धर्मचर्या समाविष्ट हैं। प्राथमिक शिक्षा पूरा करने के बाद छात्र उच्च बौद्ध अध्ययन कार्यक्रम में प्रवेश कर सकते हैं। उच्च बौद्ध अध्ययन के पाठ्यक्रम का आधार साक्या परंपरा के १८ महाग्रन्थ हैं। बुद्धविनय पालन सहित मठ में ८ वीं कक्षा तक आधुनिक शिक्षा सुविधाओं के साथ प्रातः और सायं काल में अपनी परम्परा अनुसार धर्म अभ्यास का पाठ नौ वर्ष में पूरा किया जाता है। मठ की योजना है कि अधिक भिक्षुओं को प्रवेश कर उच्च शिक्षा प्रदान कर काचुपा अथवा आचार्य कक्षा तक शिक्षा प्रदान करना है। वर्तमान में मठ के उच्च अध्ययन सम्पूर्ण कर अनेक छात्र लोग खेनपो, अध्यापक व मठ के प्रभारी बन गए हैं। मठ का लक्ष्य यह है कि भिक्षुओं को सम्पूर्ण शिक्षा प्रदान कर न केवल आत्मनिर्भर बनाना है बल्कि इस मठ को और अन्य साक्या मठों तथा समस्त बौद्ध जगत् के कल्याण करने के लिए सशक्त बनाना है।

    7X46+GH3, Pokhara 33700, , Pokhara

    , 33700,

    साक्या थेगछेन फुनछोग लिङ

    साक्या थेगछेन फुनछोग लिङ

    MONASTERY

    परम पूज्य गोङमा जिगडल दगछेन दोर्जे छङ १०-२४ अक्टूबर, २००६ में भूटान का दौरा किया। वे भारत के पश्चिम बंगाल से होते हुए भूटान गये और भूटान फुनछोग लिग में ठहरे। २३ तारीख के दिन प्रातः नाश्ते पर रिनपोछे ने यह कहा है कि इस क्षेत्र में एक बौद्ध अध्ययन केन्द्र स्थापित होना चाहिए। जब उन्हें बताया गया कि यह भूटान में कठिन होगा, तो रिनपोछे ने स्पष्ट रूप से कहा है कि बौद्ध अध्ययन केन्द्र भारत में स्थापित हो। रिनपोछे के निर्देश अनुसार उचित स्थान खोजा गया। २० जुलाई २००७ को साक्या तिब्बती संस्कृति संरक्षण संघ नाम से पंजीकृत किया गया। तब से रिनपोछे का लक्ष्य पूर्ण करने का प्रारम्भ हुआ। कार्य चल रहा था किन्तु दुर्भाग्य की बात २०१६ में दगछेन रिनपोछे का देहावसान हुआ। पूज्य दगछेन रिनपोछे के उद्देश्य को सफल बनाने के लिए फुनछोग फोटङ परिवार, लामा, भिक्षु, कर्मचारी सभी ने मठ और विद्यालय स्थापित करने के लिए अथक प्रयास किया है। मठ और विद्यालय स्थापना का लक्ष्य तिब्बती बौद्ध धर्म का अध्ययन और अभ्यास करने के लिए एक बड़ा संस्थान बनाना है। विशेषकर यह संस्थान इसे दगछेन रिनपोछे के तीन पौत्र— अविकृत वज्र रिनपोछे, अभय वज्र रिनपोछे और असंग वज्र रिनपोछे के लिए निर्वासन में विद्यापीठ स्थापित है। यहाँ साक्या पूर्व गुरुओं की निर्मल परम्परा को आधार बनाकर तथा नालन्दा से उद्भूत महान् शास्त्रों का अध्ययन-अध्यापन किया जाता है। यहाँ साक्या परम्परा के मार्गफल (लमडे) धर्म का प्रवचन होता है। विश्व शान्ति के लिए दैनिक तारा अनुष्ठान, धर्मरक्षक देवताओं की पूजा, शुक्ल दशमी में साक्या परंपरा अनुसार गुरु टगपो की साधना पूजा, प्रत्येक वर्ष वज्रकीलक साधना-पूजा, हेवज्र साधना-पूजा, वज्रयोगिनी पूजा आदि आयोजित की जाती है। प्रतिवर्ष साक्या के पाँच प्रमुख प्रवर्तक आदि गुरुओं का परिनिर्वाण दिवस में पूजा की जाती है। यहाँ ध्यान-साधना, बौद्धधर्म का परिचय, उसी प्रकार समय और काल अनुसार धार्मिक पूजा-अनुष्ठान कराने का भी लक्ष्य है। संक्षेपतः इस मठ का उद्देश्य समस्त बौद्ध यानों का अध्ययन-अध्यापन करना है। मंदिर में पूजा आधार के तौर पर बुद्ध शाक्यमुनि, तीन दीर्घायु के देवता, और साक्या सम्प्रदाय पांच प्रवर्तक आचार्यों की मूर्तियाँ हैं। ग्रन्थालय में कग्यूर, तेनग्यूर, विभिन्न परंपराओं के बौद्ध-विद्वानों की रचनाएँ, तिब्बती बौद्ध धर्म से संबन्धित दुर्लभ ग्रन्थ, आधुनिक विद्या से सम्बन्धित पुस्तकें तथा पूज्य जिगडल दगछेन रिनपोछे के अस्थि-स्तूप है। हेवज्रालय में मार्गफल देव-गण क्षेत्र, नाथालय में तीन गुर-शल देव, पलदेन मगसोर ग्यालमो आदि धर्मरक्षक देवताओं की मूर्तियाँ हैं। तारा-आलय में 21 तारा देवियों की मूर्तियाँ हैं। अवलोकितेश्वर-आलय में समय समय से उपवास आयोजित किया जाता है। मञ्जुघोषालय में तीन कुल नाथों की मूर्तियाँ हैं और यहीं प्रतिदिन मञ्जुश्रीनामसंगीति और गङलोमा स्तुति का पाठ होता है। साक्या तिब्बती संस्कृति संरक्षण सोसाइटी द्वारा संचालित यह स्कूल, हिमालयी क्षेत्रों और स्थानीय क्षेत्रों के बच्चों के लिए प्राथमिक से विश्वविद्यालय स्तर तक बौद्ध शिक्षा और आधुनिक स्कूली शिक्षा प्रदान करना लक्ष्य रखता है। इस विद्यालय का नाम बौद्ध भारती स्कूल है। यहाँ पाठ्यक्रम तिब्बती भाषा पर आधारित है, जबकि आधुनिक भाषाओं और विज्ञान को शामिल करते हुए, समकालीन शिक्षा के माध्यम से तिब्बती बौद्ध संस्कृति को संरक्षित करने पर ध्यान केंद्रित करता है। यह विद्यालय स्थान भूटान फुनछोगलिग से नजदीक और पंचिम बंगाल में स्थित जयगाँव में है। यह स्थान विशाल और सुन्दर है। यहाँ से भूटान की पर्वत-शृंखला देखी जा सकती है। पास में नदी बहती है। इस विद्यालय का क्षेत्रफल 15 एकड है। विद्यालय सात मंजिला है। पाँचवे और छठे तल पर दाये और बाये चार कक्ष में हैं। एक परम पावन दलाई लामा जी का कक्ष है। एक में पुस्तकालय है। कर्मचारियों के छह कार्यालय हैं। एक अध्यापक-कक्ष है। बीस कक्षायें हैं। दो कमप्यूटर कक्षाएँ हैं। दो सभाकक्ष हैं। भिक्षुओं के लिए 40 कक्ष हैं। छात्रों और छात्राओं के लिए 16 कक्ष हैं। एक बड़ी और एक छोटी पाकशाला है। सार्वजनिक शौचालय 24 हैं। भविष्य में क्रीडा-क्षेत्र, तिब्बती चिकित्सालय, वृद्धाश्रम आदि निर्माण करने की योजना है।

    Sakya thegchen Phuntsokling Jaigaon sakya heritage society Bhuddha nagar Bara mechia Busty JAYGAON, , JAYGAON

    , 736182

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