icon

नेकोर

  • मूर्तियाँ
  • मठ
  • त्योहार
  • तीर्थ यात्रा
  • संपर्क करें
धर्म एवं संस्कृति विभाग
    घरमठन्यिंगमा
    Lhodak Kharchu Duejomling

    Lhodak Kharchu Duejomling

    MONASTERY

    Lhodrak Kharchu Dudjom Ling: Kunkhyen Padma Karpo restored the meditation cave and founded the monastery on the site where the great accomplished Melong Dorje and Kuma Raja, the two teachers and disciples, resided. In 1679, in accordance with the decree of the Fifth Dalai Lama to write the monastery's charter, the Nyingma school was developed and expanded with the tradition of Namdroling Monastery, adorned by the practice of Rigzin Jangpa Yabsey, and was named Lhodrak Kharchu Dudjom Ling. After the changes in Tibet, according to the vision of His Holiness the Dalai Lama, the seventh reincarnation of Nubchen Namkhai Nyingpo, Tenzin Gyaltsen, built a new monastery in Bumthang Lhamkhar, Bhutan, in 1982. In 1994, he established a shedra and a drubdra. Currently, there are about 537 monks who study the thirteen major texts from the first to the ninth year, including sutra, tantra, and other fields of knowledge. Upon completion of their studies, they are awarded certificate.

    Lhodak Kharchu Duejomling, P.O. Chamkhar

    Bumthang,

    तागशाम यिदम गोंगदुए ओर्गेन समतेन लिङ

    तागशाम यिदम गोंगदुए ओर्गेन समतेन लिङ

    MONASTERY

    तागशाम यिदम गोंगदुए ओर्गेन समतेन छोसलिङ की स्थापना सन् 1675 में पोवो क्षेत्र (तिब्बत) में प्रथम तागशाम निधि-ग्रन्थ आविष्कार कर्ता नुईदेन दोर्जे ने की थी। पत्थर में सफेद शंख की भाँति होने से यह नाम दो दुङ गोन से भी विख्यात हुए। यह मठ तामशाम उत्तराधिकारियों का विद्यापीठ है। इस मठ को पांचवें दलाई लामा से आधिकारिक पत्र और मुहर प्राप्त है। परम पावन चौदहवें दलाई लामा की कृपा से सातवें तागशाम कर्म योङदुई छोसकी निमा ने 1978 में दोनदेन लिङ बस्ती, कोल्लेगाल, दक्षिण भारत में दूसरे तागशाम केंद्र की स्थापना की। यहाँ परम पावन दलाई लामा सहित अनेक महान् गुरुओं का आगमन हुआ तथा उन लोगों के द्वारा यह मठ अधिष्ठित है। यहाँ 36 भिक्षु हैं तथा वे तागशाम परम्परा अनुसार अनुष्ठान करते हैं तथा तागशाम परम्परा का संरक्षण व संवर्धन करते हैं।

    Tagsham Ogyen Samten Choeling, Chamrajnagar, P.O. Tibetan Settlement Kollegal Taluk,

    Karnataka,

    सङग छोसखोर लिङ

    सङग छोसखोर लिङ

    MONASTERY

    ङग्युर दोर्जे डक साङग छोसखोर लिङ को पांचवें दलाई लामा के रिश्तेदार सिलनोन वांग्याल डोर्जे उर्फ शाबडुंग थुतोब डगपा ने अपनी माता के निधन के बाद दोर्जे डग रिगजिन पेमा ठ्रिनले को पूज्य गुरु मानकर साङग छोसखोर लिङ मठ का निर्माण कराया। इस मठ का इतिहास 313 से अधिक वर्षों का है। लेकिन सांस्कृतिक क्रांति के दौरान इसका समूल विनाश किया गया और आज केवल अवशेष ही देखने को मिलता है। सम्पूर्ण बौद्धधर्म और विशेषकर ञिङमा ल्हाडग की परम्परा की गम्भीर स्थिति को देखते हुए 1973 में तगलुङ चेटुल रिनपोछे ने मुंडगोड (दक्षिण भारत) में स्थित तिब्बती बस्ती में इस मठ की स्थापना की। इस मठ के मुख्य पूजा-आधार के रूप में गुरु नङसिद सिलनोन, शास्ता मुनीन्द्र बुद्ध और अवलोकितेश्वर आदि की प्रतिमाएँ हैं। मठ के वचन पूजा-आधार के रूप में कग्यूर, तेनग्यूर, रिनछेन तेरजोद, ञिङमा तन्त्र-संग्रह, लोङछेन रबजम का कृति-संग्रह आदि हैं। मठ के चित्त पूजा-आधार में ताम्र-कांस्य निर्मित विजय स्तूप आदि हैं। सन् 1987 के बाद यहाँ परम पावन दलाई लामा जी ने तीन बार इस मठ का दौरा किया है। परम पावन ने इस मठ की प्राण-प्रतिष्ठा की और यहाँ गम्भीर प्रवचन दिये। आज तगलुङ चेटुल रिनपोछे सहित लगभग 34 भिक्षु हैं। युवा भिक्षु अपनी परम्परा अनुसार ञिङमा के उत्तर निधि की साधना, पाठ-गायन, मण्डल-लेखन, शंख आदि वादन करत हैं। वरिष्ठ भिक्षु उत्तर निधि का पूर्वयोग पूर्ण कर साधना करते हैं।

    San-Ngak Choekhorling, Lama Camp No. 1 P.O. Tibetan Colony Mundgod, Karwar

    Karnataka, 581411

    पेमा सङग छोसखोर लिङ

    पेमा सङग छोसखोर लिङ

    MONASTERY

    सङग छोसखोर लिङ नामक मठ तिब्बत के किरोङ में कर्युद सम्प्रदाय के गुरु शङ रिनपोछे ने किया था। ल्हागङ गोन, नगा गोन, ल्हादुन गोन – जैसे महान् धर्म-केन्द्र हुए। यहाँ पहले भिक्षुवर्ग का बाहुल्य था। किन्तु बाद में यह केन्द्र केवल ञिङमापा के तान्त्रिकों वर्गों के लिए हुआ। यह स्थिति तिब्बत की पराधीनता से पहले की है। भारत ञिङ्मा केंद्रों के छह प्रमुख विद्यापीठों में से पलयुल विद्यापीठ के ११वें पीठाधिपति डुबवङ पेमा नोर्बु रिनपोछ जी की सहायता से सन् 2000 में बैलकुप्पे दक्षिण भारत में स्थित द्वितीय बस्ती में इस मठ का शिलान्यास हुआ। इसका समग्र निर्माण 2007 में पूरा हुआ। आज यहाँ लगभग 18 तांत्रिक साधना अधिगम-शासन का संवर्धन और संरक्षण में संलग्न हैं।

    Pama Sang Ngag Choekhorling, Dickyi Larsoe, P.O, Bylakuppe, Mysore

    Karnataka, 571104

    थेगछोग होदसल पलयुल छोसलिङ

    थेगछोग होदसल पलयुल छोसलिङ

    MONASTERY

    थेगछोग होदसल पलयुल छोसलिङ— ञिङ्मा सम्प्रदाय के छह महान् केन्द्रों में पूर्व पलयुल महाकेन्द्र में रिगजिन कुनसङ थेरब से अद्यावधि ११ पलयुल पीठाधीश हुए। तिब्बत पर चीनी कब्जे के बाद पलयुल मठ के जोङनङ रिनपोछे ने सन् 1986 में नेपाल में पूजा-आधार सहित नवीन मठ की स्थापना की। बाद में पूज्य डुबवांग पेमा नोर्बु रिनपोछे ने इसका संरक्षकत्व का दायित्व ग्रहण किया। आज जोङनङ रिनपोछे के यङसिद की देखरेख में यहाँ तिब्बती, भारतीय, भटानी और नेपाली सहित कुल 75 भिक्षु अध्ययनरत हैं।

    Palyul Choeling Monastery, P.O. Box No. 3630, Ward # 6 Ramhiti, Boudhanath

    Kathmandu, NA

    Shechen Chodzong Nunnery

    Shechen Chodzong Nunnery

    NUNNERY

    Shechen Chodzong Nunnery was founded in Kham Dege by Shalu Rabjampa Tenpal Gyaltsen, the first reincarnation, in 1698. He entrusted the teachings to eight great students, including Gadyak Lama Padma Gyaltsen, and twenty-five successors capable of accomplishing both aims. The second Rabjampa reincarnation, Rigzin Paljor Gyatso, moved the monastery to a nearby location and named it Shechen Tenzin Dargyeling. The original monastery gradually became a nunnery. After the changes in Tibet, when Kyabje Dilgo Khyentse Rinpoche gave the first empowerment of the Rinchen Terzo, a devoted Bhutanese former judge named Gadzom offered a piece of land, and in 1971, this nunnery was rebuilt in Thimphu, Bhutan. Currently, under the care of both the reincarnation of Dilgo Khyentse Rinpoche and Shechen Rabjam Rinpoche, approximately 80 nuns from Tibet and Bhutan are preserving the teachings through study and practice.

    Shechen Chodzong Nunnery, P/o Khasadrabchu

    Thimphu, 11001

    फुनछोग ङ-यब छोसखोरलिङ

    फुनछोग ङ-यब छोसखोरलिङ

    MONASTERY

    फुनछोग ङ-यब छोसखोरलिङ— सन् 1959 में श्रद्धेय चाडल सङ्गे दोर्जे रिनपोछे ने इस मठ का पुनरुत्थान कर तीन आधारों को स्थापना की। काय, वाक्, चित्त के मुख्य आधार के रूप में गुरु रिनपोछे नङ सिद सिलनोन की प्रतिमा आदि हैं। यहाँ भिक्षुगण सूत्रों व तन्त्रों का श्रवण, मनन और भावना अविभाज्य रूप में करते हैं। साधना-केंद्र से तीन वर्ष की साधना की श्रृंखला पूरी करने के बाद मठ के प्रावधान अनुसार भिक्षु-गण विद्यालय में रहते हैं। आज तब साधना करने वालों के तीन बैच हुए हैं। वे सभी प्रमुखतया क-थोग परम्परा के अनुसार पूजा-पाठ, वार्षिक प्रातिहार्य दिवस में विद्या-धर गण लक्ष पूजा, बुद्ध-वचन का पाठ, तारा देवी स्तोत्र का एक लाख पाठ आदि से बुद्ध-शासन और लोगों के लिए प्रार्थना करते हैं। ञिङमा सम्प्रदाय के मुख्य गुरु पूज्य चाडल सङ्गे दोर्जे रिनपोछे इस मठ के संरक्षक हैं।

    Phuntsok Ngayab Choekhorling , Senchal Road, Jorebunglow P.O. Ghoom, Darjeeling

    West Bengal, 734102

    ङग्युर डुबग्युद छोसफेल लिङ

    ङग्युर डुबग्युद छोसफेल लिङ

    MONASTERY

    ङग्युर डुबग्युद छोसफेल लिङ— तिब्बत में उत्तर नमछो छुगमो की चारों दिशाओं में चार मठ हैं। उनमें यह मठ दक्षिण का गुरछुङ ञिङ्मा मठ ही है। जब चीन ने तिब्बत पर कब्जा किया, तो इस मठ को ध्वस्त किया गया था। गुरछुङ के सातवें लामा लोडोस पलजोर जङपो ने सन् 1974 में भंडारा (भारत) में स्थित नोरग्ये लिङ बस्ती में नवीन प्रार्थना-केन्द्र का निर्माण किया और साधना-मठ, दशमी पूजा हेतु मठ का निर्माण किया। तिब्बत और नेपाल के सीमावर्ती क्षेत्रों से आये भिक्षु यहाँ ञिङ्मा परम्परा अनुसार रिगजिन जछोन ञिङपो कोनछोग चीदुस, शिठो ङेदोन ञिङपो, शिठो करलिङ छोगले नाछोग रिनछिन ठेङवा आदि ञिङ्मा परम्परा का विधि-विधान का अनुष्ठान करते हुए अध्ययन के लिए संलग्न हैं। सम्प्रति यहाँ हमेशा ३१ भिक्षु रहते हैं। यहाँ भिक्षु भिक्षुणी व तान्त्रिक तीन मिलकर ञिङमा परम्परा का संरक्षण करते हैं।

    Ngagyur Drupgyu Choepheling , P.O. Pratapgarh, Bhandara

    Maharashtra, 441702

    गोनज्यंग ओर्गेन दोङग छोखोर लिङ

    गोनज्यंग ओर्गेन दोङग छोखोर लिङ

    MONASTERY

    गोनज्यंग ओर्गेन दोङग छोखोर लिङ की स्थापना छठे गुरु रिगजिन छोसफेल ने 19वीं शताब्दी में तिब्बत के वुई चङ प्रदेश के तिङके नामक स्थान में की थी। उनके शिष्य थडल दोर्जे ने सन् 1980 में इस मठ की स्थापना गंगटोक, सिक्किम भारत में की। 1981 में इस मठ में परम पावन दलाई लामा ने पधारे और इस केन्द्र को अनुष्ठित किया। क्यबजे डोडुब रिनपोछे ने इस मठ का नाम गोनज्यंग ओर्गेन दोङग छोखोर लिङ रखा। 1995 में गोनज्यंग अध्ययन केंद्र स्थापित किया गया था। क्यबजे जिग्ड्रेल् येशे डोर्जे की यह अचूक भविष्यवाणी थी कि यह विशाल अध्ययन केन्द्र के रूप में स्थापित होगा। उत्तर मठ (ज्यंग गोन) के प्रमुख अवतारी पुरुष ओर्येन जिगमेद ठिनले कुन-ख्यब की देखरेख में आज यहाँ साधना-केन्द्र, प्रवचन-केन्द्र, प्रार्थना-गृह का पुनर्निर्माण हुआ। आज तिब्बती, मोन-वासी, भूटानी, नेपाली सहित कुल 110 भिक्षु हैं। यहाँ उत्तर निधि आविष्कारों की परम्परा अनुसार साधना की जाती है। रोङसोम और लोङछेन के मत अनुसार शास्त्रों का अध्ययन होता है।

    Gonjang Ogyen Dongak Choekhorling , Bhojogari, Gangtok

    Sikkim, 737101

    • 1
    • 2
    • More pages
    • 10
    • Next