
भेन्छेन फुन्छोग धारग्ये लिङ— इस मठ की स्थापना 17वीं शताब्दी में तिब्बत दोखम गदोद में चतर्थ सङ्गे ञेनपा द्वारा की गयी थी। निर्वासन में, 1986 में पूज्य सङ्गे ञेनपा रिनपोछे ने स्वयम्भूनाथ नजदीक आश्रय-आश्रेय सहित मठ का निर्माण किया। इसकी शाखा के रूप में फारफिङ (दक्षिणकाली) में होसल लिङ साधना-केन्द्र, भिक्षुणी साधना केन्द्र आर्या तारा लिङ, प्रारम्भिक विद्यालय खेनरब पेदछल लिङ की स्थापना हुई। सन् 2004 में फारफिङ आसुरी गुफा के नजदीक आश्रय-आश्रेय सहित नङतेन थोस सम लिङ की स्थापना की गयी। इस मठ में शिक्षा— डछङ विद्यालय में कमा और तेरमा के समस्त प्राचीन और नवीन तन्त्रों का पाठ, नृत्य सूत्रण व स्वर-गायन, तोरमा निर्माण और अलंकरण, उत्पत्ति और निष्पत्ति का अभ्यास के साथ साथ तिब्बती भाषा व्याकरण का अध्ययन होता है। क्रमशः महान शास्त्रों का अपनी क्षमता अनुसार अध्ययन-अध्यापन होता है। प्रतिवर्ष तिब्बती नववर्ष की प्रार्थना से लेकर तन्त्र के अनुसार पटचित्र निर्माण, रज द्वारा मण्डल निर्माण कर साधना की जाती है। साधना केन्द्र में महामुद्रा के पूर्वयोग से लेकर तीन वर्ष तीन पक्ष में नारोपा के षड् धर्म, मुक्तिमार्ग महामुद्रा, तीन मूल देवों के उत्पत्ति- निष्पत्ति क्रम से साधना की जाती है। शेदडा (महाविद्यालय) में मुख्यतः अपनी परम्परा के अनुसार सूत्रों और तन्त्रों से सम्बद्ध आठ महाशास्त्रों, भाषा-व्याकरण तथा इतिहास आदि का अध्ययन-अध्यापन होता है। इसी प्रकार, भिक्षुसंघ सामूहिक रूप से बुद्ध के उपदेशों के अनुसार विनय के तीन वस्तुओं का अभ्यास करते हैं। इसके अतिरिक्त गुरु छोसवङ के लामा सङदुस विधि अनुसार दशमी तिथि में नृत्य, छोगलिङ विधि अनुसार कीलक महासाधना से तोरमा प्रक्षेपण और चार कर्मों से होम आदि होता है। इसके अतिरिक्त कर्मा कमछङ परम्परा अनुसार की विधि से तोरमा प्रक्षेपण और चार कर्मों से होम आदि किया जाता है। वर्तमान में पूज्य सङगे ञेनपा रिनपोछे और पूज्य तेनगा रिनपोछे के अधिपतित्व लगभग 456 भिक्षु हैं।
Benchen Phuntsok Dhargyeling, P76Q+3MX, Chauni Hospital Marg
Kathmandu, 44600

कग्यूद छेछोग लिङ की स्थापना सन् 1770 में तिब्बत और भारतीय सीमा क्षेत्र के निचले डोमो में कग्यूद टुलकु पूज्य तेनजिन ञिदा रिनपोछे ने की। यह मठ दगपो कग्यूद परम्परा में से पलदेन डुगपा तोदडुग परम्परा को मानता है। सन् 1959 में, चीन द्वारा धर्म के देश के जबरन दमन के कारण, अन्य तिब्बती मठों के साथ इस मठ को भी ध्वस्त किया गया। उस समय सातवें कग्यूद टुलकु पूज्य जिगमेद ङवाङ तेनपी ग्यलछेन सहित मठ के कुछ भिक्षु भारत की शरण में आ गये। भारत में कग्यूद छेछोग लिङ के किसी एक बुजुर्ग भिक्षु के कमरे में भिक्षुगण एकत्रित होकर शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष की दशमी पूजा निरन्तर करते रहे। सन् 1987 में परम पावन दलाई लामा जी की कृपा तथा अन्य अनेक भक्त दाताओं की सहायता से सिक्किम की राजधानी गंगटोक में इस डुगपा कग्यूद मठ का निर्माण हुआ। सन् 2005 में इस मठ में परम पावन दलाई लामा जी का आगमन हुआ और उन्होंने यहाँ मार्गदर्शन भी किया। आज यहाँ 21 भिक्षु हैं।
Kagon Tsechokling , J.N. Road Chendmari P.O. Raj Bhawan
Sikkim, NA

ड्रिगुङ डुजिन थोगथोग लिङ अथवा उपवास मठ— बीर तिब्बती बस्ती के निवासी स्व. योरे छङ चोनडुस सेगे ने पूज्य वोनटुल रिनपोछे से यह निवेदन किया कि परम पावन दलाई लामी जी की पूजा-अर्चना तथा अन्य कोई भी धार्मिक पूजा आदि के लिए एकत्रित होने हेतु बस्ती में धार्मिक केन्द्र की आवश्यता है। तदनुसार पूज्य वोनटुल रिनपोछे ने भूमि प्रदान की। सन् 2008 में स्व. चोनडुस सेङगे ने ही अर्थसंचय कर मठ का निर्माण किया। मठ निर्माण पूर्ण होने पर डुबग्यूद कग्यूद परम्परा के महान् गुरु परम पूज्य ड्रिगुङ छेछङ रिनपोछे जी को आमन्त्रित कर रिनपोछे के करकमलों से मठ का अनावरण किया गया। यहाँ सर्वसाधारण प्रतिवर्ष धार्मिक उपवास उपोषध व शुभ तिथियों व पर्वों में पूजा-अर्चना करते हैं।
Drikung Nyungney Lhakhang, Drongtoe Rd, Bir Colony, Chaugan
Himachal Pradesh, 176077

नेनङ फुनछोग छोसलिङ की स्थापना प्रथम शमर रिनपोछे तोगदेन डगपा सेङ्गे ने तिब्बत देछेन जोङ में की। कर्मापा छोसडग ग्याछो रिनपोछे ने पावो छोसवांग ल्हुनड्रुप को कग्यूद मरपा महानुवादक विद्यापीठ डोवो लुङ मठ का अधिपति नियुक्त किया। उनके नौवे अवतार ने ल्हासा के पास दोदलुङ देछेन जोङ के मठ की देखरेख की। नौवे अवतार से पहले शमर अवतार रिनपोछे लोगों ने मठ की देखरेख की। तिब्बत पर चीनी आक्रमण के बाद चौदहवें पावो गुरु चुगलग मवी वङछुग ने सन् 1985 में बौद्धनाथ काठमण्डू में यह मठ स्थापित किया। आज 15वें पावो चुगलग यहाँ के अधिपतित्व में अभिषेक, आगम आदि प्रदान किया जाता है। इस केन्द्र में 25 भिक्षु अध्ययन-अध्यापन व साधना में संलग्न हैं।
Nehnang Phuntsok Choeling , P9F4+38,
Kathmandu, 44600

ग्यालवा कर्मापा दुददुल दोर्जे के अनुसार भविष्यवाणी अनुसार चौथे रिपा बगयोद ने सन् 1765 में खम के नंगचेन के राजा के राज्य डोङमेद वेहु नामक पर्वत पर पाल रिगोन थुबतेन समडुब छोसखोर लिङ मठ की स्थापना की। भारत में 8वें रिपा बगयोद कर्मा शेदडुब छोसकी सेंगे शेनफेन थये रिनपोछे ने सन् 1994 में दक्षिण भारत कोल्लेगाल तिब्बती बस्ती में इस मठ की स्थापना की। आज, यहाँ तिब्बती और भारतीय कुल 22 भिक्षु हैं।
Pal Rigon Thupten Samdup Choekhorling, V- Village, Kollegal Taluk, Dhondenling Tibetan Settlement
Karnataka, 571457

ज़िगर टशी थुबतेन छोसखोर गेफेल लिङ— बीर देगे-बस्ती में अन्तर्भूत चोनतारा बासिन्दे ने 16वें कर्मापा द्वारा मान्यता प्राप्त पूज्य सातवें जिगर जिगमेद मिफम तेनपी ञिशोन को भूमि प्रदान की थी। तदनुसार पूज्य जिगर रिनपोछे ने सन् 1974 में बीर देगे बस्ती में निर्वासन में यह प्रथम जिगर विद्यापीठ स्थापित किया और इसे साधना अध्यापन का प्रमुख केन्द्र बनाया। सन् 1980 में इसे बौद्ध तीर्थ स्थल रिवालसर में स्थानान्तरित किया गया। बीर देगे बस्ती स्थित जिगर मूल जिगर मठ में स्थायी रूप से 4 भिक्षु रहते हैं और गर्भगृह, पुण्य पर्व की पूजा-अर्चना सहित प्रतिदिन पूजा-साधना करते हैं।
Zigar Drukpa kagyug monastery P.O. chauntra, Mandi
, 175032

खमटुल रिनपोछे अपने अपने शिष्य-दल के साथ भारत में निर्वासन में आये। अतः खेनपो चोनडुस, खेनपो छोसदार, और खेनपो रिनछेन आदि ने कलिंगपुंग और डालहौज़ी में शिक्षण कार्य जारी रखा। बाद में खेनचे येशे रिनपोछे ने खमपा गर टशी जोङ में अध्ययन हेतु शेदडा अर्थात् महाविद्यालय और भिक्षुओं के निवास हेतु आवास की व्यवस्था प्रदान की। क्रमशः यहाँ तिब्बती, भूटानी, लद्दाखी, लाहौल-निवासी, किन्नौरी, स्पीति-वासी, तामांग, शेर्पा आदि डुगपा कग्यूद के अनुयायी यहाँ अध्ययन के लिए एकत्रित हुए। अध्यापन के लिए खेनपो खेडुब, खेनपो रिनछेन आदि निमन्त्रित किये थे। और उन खेनपो ने निरन्तर अध्यापन कर मठ का संवर्धन किया। छात्रों की संख्या अधिक बढी और मठ-विद्यालय का विस्तार करने का विचार उपस्थित हुआ। तदनुसार सन् 2019 में नव-निर्मित शेदडा में स्थानान्तरित किया गया। वर्तमान में, लगभग 211 भिक्षु अपने परम्परा अनुसार गुरु के मतों का अध्ययन करते हैं और साथ में बुतोन रिनपोछे और भारतीय बौद्ध आचार्यों एवं तिब्बती आचार्यों के मत-मतान्तरों को शामिल कर अध्ययन करते हैं। सिर्फ दो महीने के अतिरिक्त पूरा वर्ष यहाँ भिक्षु गण अध्ययन में संलग्न रहते हैं।
T.C.C. Tahi Jong P.O. Taragarh Bheth Jhikli, , Kangra
, 176081

पलपुंग येशे रबग्ये लिङ— यह भिक्षुणी मठ है। श्रद्धेय जमगोन दोर्जे चङ की परिकल्पना अनुसार विद्यापीठ समिति ने सन् 2007 में हिमाचल स्थित कुलू बजोर में निर्वासन में प्रथम पलपुंग विद्यापीठ की स्थापना की। इसका नाम पलपुंग येशे रबग्ये लिङ रखा गया। 2013 में विद्यापीठ प्रशासन समिति के समर्थन और सभी कर्मचारियों के प्रयासों के से विहार, ऊपरी मञ्जिल में परम पूज्य का शयन कक्ष, भिक्षुणियों के लिए आवास आदि का निर्माण प्रारब्ध हुआ। सन् 2018 में आधार-आधेय सहित मठ निर्माण सम्पन्न हुआ। वर्तमान में, लगभग 175 भिक्षुणियाँ अध्ययन में संलग्न हैं। भिक्षुणियाँ तीन वर्ष में लेखन, पठन से लेकर अंग्रेजी, हिंदी और गणित का प्रारम्भिक अध्ययन करती हैं। तत्पश्चात् वे समस्त विद्या-स्थानों और विशेष कर पाँच महाशास्त्रों का अध्ययन नौ वर्ष करती हैं। इसके अतिरिक्त भिक्षुणियाँ यहाँ चिकित्सा विद्या और ज्योतिष विद्या का अध्ययन भी होता है। इस प्रकार भिक्षुणियाँ आठ वर्ष का अध्ययन पूर्ण कर चिकित्सा ज्योतिष सहित कचुपा उपाधि प्राप्त करती हैं। पलपुंग की प्राचीन परम्परा अनुसार पूजा-पाठ विधिविधान शंख-वादन, तोरमा निर्माण व अलंकरण आदि का प्रशिक्षण, साधना केन्द्र जङछुब समतेन लिङ में मरपा, मिला और दगपो रिनपोछे की गुरु-साधना, वज्रकील, चक्रसम्वर, और गुह्यसमाज की साधना, छह गम्भीर नारोपा धर्मों, शङपा के छह निगुमा धर्मों का दृश्य परम्परा पूजा-पाठ तथा शास्त्रों का अध्ययन सम्पूर्ण कर भिक्षुणियाँ भिक्षु की भाँति उप-आचार्या, आचार्या, उपाध्याया आदि का दायित्त्व ग्रहण करती हैं। पलपुंग शेरब लिग विद्यापीठ की प्रशासन समिति व गुरु के वैयक्तिक कोश की देखरेख में यह भिक्षुणी मठ सञ्चालित है।
Palpung Yeshi Rabgyeling Nunnery, Village Mashgoan, P.O, Bajaura, Kullu
, 175125

पाल कग्यूद शेदडुब टशी दरग्ये फुनछोग लिङ की स्थापना सन् 1276 में तगलुङ यरथङ धर्मस्वामी के चौथे उत्तराधिकारी जेचुन सङगे वोन ने तिब्बत खम प्रान्त के विशोद पर्वत पर की थी। तब से तगलुङ का दो विभाजन हुआ- तङलुङ थरथङ और तङलुङ मरथङ। इस मठ के मुख्य पूज्य आधार के रूप में नारोपा के अस्थि-अलंकार, आचार्य दीपंकर की टोपी व घण्टी, फगमो डुबपा की प्रतिमा, तगलुङ थङपा रिनपोछे की रजत प्रतिमा, वचन-आधार के रूप में स्वर्ण व रजम में लिखित पुस्तकें, चित्त आधार के रूपमें स्वर्ण, रजत, चन्दन व मृत्तिका निर्मित १०० से अधिक स्तूप हैं। निर्वासन में सन् 2000 में सातवें फगछोग रिनपोछे तेनजिन जिगमेद डगपा और खम रिवोछे के लोगों ने मिलकर बौद्धनाथ (काठमण्डू, नेपाल) के नजदीक रामहिटि में यह नया मठ स्थापित किया। आज सातवें फगछोग रिनपोछे के संरक्षकत्व में 52 भिक्षु हैं और वे अपनी परम्परा अनुसार धर्म आचरण और अध्ययन अध्यापन करते हैं।
P9JF+62H, , Kathmandu
, 44600