
सेरा मेद थोससम नोरलिङ मठ— सन् 1421 में आचार्य चोङखापा के प्रत्यक्ष शिष्य कुनखेन जङछुब बुमपा पलजङपो ने इस मठ की स्थापना सर्वप्रथम की। यह मठ तिब्बत में स्थापित था। तब से यहाँ अध्ययन-अध्यापन व साधना में तल्लीन अनेक विद्वान अविच्छिन्न रूप से हुए हैं। यह केन्द्र सामान्यतया बौद्धशासन तथा विशेषतया आचार्य चोङखापा के शासन का संरक्षण व संवर्धन करने का मुख्य केन्द्र रहा। क्रमशः भिक्षुओं की संख्या बढने से यहाँ 16 भिक्षु-आवास बने। 1959 में हुए तिब्बत पर चीनी हमले के बाद इस मठ के कई भिक्षु भारत में आये। वे प्रारम्भ में बक्सर धर्म-अध्ययन केन्द्र में बसे। अनेक कठिनाइयों के बावजूद उन लोगों ने तिब्बती बौद्ध धर्म व संस्कृति का संरक्षण करते हुए धार्मिक गतिविधियों को बनाए रखा। 13 दिसंबर, 1963 को वे बैलकुप्पे, मैसूर में स्थानांतरित हो गए। तिब्बत से आये हुए वरिष्ठ भिक्षुओं ने वन भूमि को साफ किया और आवास और सभा भवन बनाने के लिए लकड़ी काट कर नवीन आवास और मठ बनाने के लिए परिश्रम किया।बौद्ध धर्म के संरक्षण, पुनरुद्धार व संवर्धन के लिए अनेक कठिनाइयों का सामना करते हुए 1974 में सेरा जे और सेरा मेद का दो मठ निर्मित हुआ। सन् 1982 में विशाल प्रार्थना भवन मठ का निर्माण प्रारम्भ हुआ और 1987 में सेरा मेद का मठ का निर्माण सम्पन्न हुआ। इसी के साथ मठ के विद्यार्थियों और प्रशासन की वृद्धि हुई। प्रत्येक वर्ष भिक्षुओं की संख्या बढ़ने के कारण मठ-विस्तार की परियोजना प्रारम्भ हुई। सन् 2002 में नवीन मठ का निर्माण सम्पन्न हुआ। परम पावन दलाई लामा की गरिमामयी उपस्थिति में तथा पूज्य जङचे छोसजे, अन्य विद्यापीठों के भूतपूर्व खेनपो आदि, सभी सम्प्रदायों के लामा टुलकु, कर्णाटक प्रदेश के मुख्यमंत्री, तिब्बत के धर्म और संस्कृति मंत्री और तिब्बती भक्तजनों की उपस्थिति में इस मठ का उद्घाटन किया गया। परम पावन ने मठ का उद्घाटन तथा प्राण-प्रतिष्ठा कर धर्म-प्रवचन किया। सन् 2007 में शास्त्रार्थ-शाला का चौडीकरण व पुनर्निमाण किया गया। सम्प्रति मठ में 1,327 भिक्षु हैं। सभी भिक्षु मिलनसार और विनय का पालन करते हुए भारतीय आचार्यों द्वारा रचित शास्त्रों तथा तिब्बती विद्वानों के शास्त्रों का समान रूप से अध्ययन करते हैं। विशेषकर यहाँ भिक्षु आचार्य चोङखापा और उनके प्रमुख शिष्यों द्वारा रचित ग्रन्थों तथा मठ के विशेष ग्रन्थों के आधार पर अध्ययन-अध्यापन करते हैं। इतिहास, भाषा, व्याकरण, काव्य जैसे सामान्य विषयों का भी यहाँ अध्ययन किया जाता है। भिक्षु अध्ययन-अध्यापन, शास्त्रार्थ, शास्त्र-प्रणयन कर आचार्य चोङखापा की परम्परा का संरक्षण और संवर्धन कर रहे हैं। मठ के शैक्षिक पाठ्यक्रम में 18 वर्षों का है। पहले कक्षा में श्वेत रक्त वर्ण इत्यादि दुसडा लघु, मध्य, बृहत् ग्रन्थों का, चोने डगपा शेदडुब रचित गोरिग तगरिग का अध्ययन किया जाता है। तत्पश्चात् प्रज्ञापारमिता अभिसमयालंकार की नवीन कक्षा, पुरानी कक्षा, उत्तर पुरानी कक्षा, द्वितीय अधिकार, चतुर्थ अधिकार, प्रथम सुरकोल, द्वितीय सुरकोल का अध्ययन होता है। तदन्तर प्रथम नवीन मध्यमक कक्षा, द्वितीय नवीन मध्यमक कक्षा, प्रथम पुरानी मध्यमक कक्षा और द्वितीय पुरानी मध्यमक कक्षा में अध्ययन किया जाता है। तत्पश्चात् पूर्व विनयवस्तु, विनय और अभिधर्मकोश कक्षा, केवल संकक्षिका कक्षा (जेन क्यङ जिनडा), उत्तर विनयवस्तु, तृतीय कक्षा में अधिधर्मकोश का प्रथम चार स्थान, द्वितीय कक्षा में अधिधर्मकोश का अन्तिम चार स्थान, प्रथम कक्षा में विनय और अधिधर्मकोश की पुनरावृत्ति होती है। इस प्रकार गेशे ल्हारमपा स्तर तक अध्ययन होता है। गेशे ल्हारमपा में तिब्बती पञ्चांग अनुसार प्रतिवर्ष दूसरे महीने में अधिधर्मकोश पर तथा 11वें महीने में विनय पर महाशास्त्रार्थ होता है। इस प्रकार 18 वर्षों में सूत्र सम्बन्धी ग्रन्तों का अर्थात् पाँच महान् शास्त्रों का गहन अध्ययन होता है। इसके अतिरिक्त इस मठ में प्रतिवर्ष अनेक धार्मिक पर्वों का आयोजन व पूजा-साधना की जाती है। 1976 में मठ ने अपना विद्यालय स्थापित किया, जिसे कर्नाटक राज्य सरकार से मान्यता प्राप्त है। इससे पूर्व भवन के अभाव में वृक्ष-छाया में कक्षाएँ सञ्चालित की जाती थीं। इस प्रकार यह मठ तिब्बती शिक्षा, धर्म, संस्कृति का संरक्षण और संवर्धन के लिए लक्षित कर शिक्षा प्रदान करता है। विदेशों व संघ-संस्थानों तथा विदेश में रहने वाले तिब्बती लोगों से आर्थिक सहायता प्राप्त कर भिक्षुओं को भोजन, स्वास्थ्य, पाठ्यसामग्री आदि की सुविधा प्रदान की जा रही है। 1979 में खेनपो जमपा दोनडुब ने मठ-अधिपतित्व का दायित्व निर्वाहन करते समय कुर्सी आदि बनवाया और बाहर से शिक्षकों को आमन्त्रित कर शिक्षा-क्षेत्र में विकास तथा विस्तार किया। यह विकास मुख्य रूप से अंतरराष्ट्रीय संगठनों और दाताओं के समर्थन, साथ ही मठ-अधिपतियों के समर्पण के कारण संभव हुआ। मठ युवा भिक्षुओं के लिए स्कूल, चिकित्सा सुविधाएं, भोजन कक्ष, अतिथि गृह और दुकानें के साथ अपनी सेवाओं का प्रदान करता है। यह मठ परम पावन दलाई लामी जी के दिशा-निर्देश को हृदय में रखकर हमेशा किसी भी परिस्थिति में विकास के लिए अग्रसर है।
Sera Mey Monastery, Sera Lama Camp, Bylakuppe
Karnataka, 571104

बंद्रा नोरगे लिङ तिब्बती बस्ती में अवस्थित थेगछेन लिङ की स्थापना बस्ती के लोगों तथा भिक्षुओं ने सामूहिक रूप से की। यहाँ परम पावन दलाई लामा आये और मठ का नामकरण भी परम पावन ने किया। यहाँ 8 भिक्षु हैं। डलहौंजी के तीन गेलुग विद्यापीठों के भिक्षुओं को ही यहाँ निर्वासित तिब्बती सरकार ने स्थानान्तरित किया है। इस मठ में भिक्षु विनय की तीन वस्तुओं का पालन करते हुए कुनरिग, एकवीर आदि का अनुष्ठान प्रतिवर्ष करते आये हैं। यहाँ मुख्य पूजा-आधार कग्यूर की पाण्डलिपियाँ (तिब्बती कागज) हैं और बस्ती के लोग प्रत्येक वर्ष प्रातिहार्य दिवस के अवसर पर वाचन करते हैं।
Thekchenling Monastery, Tibetan Settlement, Camp # 2, P.O. Pratap Garh, Bhandara
Maharashtra, 441702

प्रसिद्ध जङचे थोस सम नोरलिङ डछंग, महाविद्यापीठ डोग पर्वतीय गदेन नमग्याल लिङ की शाखा है। सन् 1409 में महान् गुरु चोङखापा के वुईचङ के 10 प्रदीप समान साक्षात् शिष्यों में से जमगोन कर्णपरम्परा शासन अधिपति महासत्त्व होरतोन नमखा पल जङपो ने इसकी स्थापना की। गदेन जङचे और शरचे के दो शासन अधिपतियों में से होरतोन नमखा पल ने ग्यलछव छोसजे के बाद विद्यापीठ का दायित्व संभाला। उन्होंने महान गुरु जमगोन चोङखापा के निवास के उत्तरी तरफ जङचे केंद्र की स्थापना की। उन्होंने धर्म की शिक्षा देते हुए दूसरे बुद्ध समान गुरु चोङखापा के धर्म का विजय-ध्वज फहराया। उनके शिक्षण और मार्गदर्शन के तहत, कई महान विद्वान तिब्बत की भूमि से उभरे, जैसे ग्यलछोग गेदुन डुब, जेचुन शेरब सेङ्गे इत्यादि। इस प्रकार महान् होरतोन नमखा पल ने गुरु चोङखापा के निवास गदेन के उत्तरी (जङ) तरफ एक पर्वत के शीर्ष पर जङचे की स्थापना की। इसलिए इसका नाम गदेन जङचे पड़ा। महान होरतोन नमखा पल ने सूत्र और तन्त्र की देशना की और विद्यापीठ का संरक्षण और संवर्धन किया। तब से अद्य अवधि इस विद्या संस्थान में पर्वतराज की भाँति तथा नक्षत्रराज की भाँति अनेक विद्यापीठ अधिपतियों ने अध्यापन, लेखन आदि कार्यों से इस विद्या संस्थान का संरक्षण किया और निरन्तर कर रहे हैं। इस विद्यापीठ से सम्बद्ध अनेक संस्थान तिब्बत के दोतोद, वुईचङ, खम – सभी प्रान्तों में हैं और सभी भिक्षु अपने अपने संस्थान में पाँच महान् शास्त्रों सहित सम्पूर्ण सूत्रों और तन्त्रों का श्रवण मनन और भावना करते हैं। वे सभी विद्वत्ता, संयमितता और भद्रता से युक्त होकर अध्यापन, शास्त्रार्थ और शास्त्र-रचना के माध्यम से बौद्ध धर्म का प्रवर्तन करते हैं। इसलिए इस विद्या संस्थान का नाम जङचे थोससम नोरलिङ डछंग समस्त तिब्बत अधिराज्य में तथा दशों दिशाओं में व्याप्त है। 17 मार्च, 1959 को, जो कि अधिकांश तिब्बती लोगों के लिए अविस्मरणीय दिन है, परम पावन दलाई लामा और कई तिब्बती लोग भारत में शरणार्थी के रूप में तिब्बत से गुप्त रूप से भाग आये। उसी दौरान पूज्य खेन रिनपोछे जेचुन येशे गवा पल जङपो सहित लगभग 1000 भिक्षु तिब्बत से भारत की शरण आये। परम पावन दलाई लामा के मार्गदर्शन में पूज्य खेन रिनपोछे जेचुन येशे गवा पल जङपो और लगभग 200 भिक्षु बक्सर में अनेक कठिनाइयों से गुजरते हुए भी इस शिक्षा संस्थान को आगे बढ़ाने का कार्य करते रहे। पुनः परम पावन दलाई लामा के मार्गदर्शन अनुसार सन् 1970 में जेचुन छुलठ्रिम छोसफेल पल जङपो सहित 173 भिक्षु बक्सर से मुंडगोड तिब्बती बस्ती में स्थानान्तरित हुए। परम पावन दलाई लामा जी की कृपा से ही यह विद्या संस्थान अपनी परम्परा अनुसार अध्ययन-अध्यापन, साधना आदि को सुरक्षित रखते हुए विकसिहत हो रहा है। यहाँ तिब्बत, भूटान, नेपाल, भारत के हिमालयीय क्षेत्र मोन, लद्दाख, स्पीति, किन्नौर, गर्शा आदि तथा मंगोलिया और अन्य देशों के लोग इस संस्थान में भिक्षु बनने के लिए आते हैं और भिक्षुओं की संख्या तेजी से बढ़ गई। आज केंद्र में लगभग 1830 भिक्षु हैं। ये भिक्षु सामान्य रूप से सूत्र और तन्त्र और विशेष रूप से आचार्य चोङखापा और उनकी शिष्य-परम्परा के शास्त्रों का गहन श्रवण मनन और चिंतन करते हुए शास्त्र-व्याख्यान, शास्त्रार्थ और शास्त्र-रचना को आगे बढ़ा रहे हैं।
Gaden Jangtse Monastery, Lama Camp No. 1, P.O. Tibetan Colony, Mundgod
Karnataka, 581411

गेलुग संप्रदाय के संस्थापक आचार्य जे चोङखापा के जीवन के उत्तरार्ध में अर्थात्, 1419 में विद्वान् शिष्य-मण्डली में गुह्य तन्त्र का प्रवचन दे रहे थे। तब उन्होंने गुह्यसमाज तन्त्र को हाथ में लेकर विद्वान् शिष्य-मण्डली से तीन बार पूछा "भविष्य में इस तन्त्र-ग्रंथ का मालिक कौन हो सकता है?"। जब अन्य विद्वानों ने उत्तर देने का साहस नहीं हुआ, तब जेचुन शेरब सेंगे उस विद्वत-मण्डली से खड़े हुए और कहा कि वह भविष्य में तन्त्र धर्म का संरक्षण और संवर्धन करूँगा। इस प्रका, उन्होंने अपने गुरु आचार्य चोङखापा के समक्ष तन्त्र शासन को संरक्षित रखने की प्रतिबद्धता व्यक्त की। इससे आचार्य चोङखापा अत्यन्त प्रसन्न हुए। आचार्य चोङखापा ने गुह्यसमाज की मूर्ति, तन्त्र की टीका इत्यादि अनेक वस्तुएँ प्रदान कर उन्हें गुह्य तन्त्र धर्म का अधिपति नियुक्त किया। इसके बाद सन् 1433 में जेचुन शेबर सेंगे ने ग्युदमेद मठ केंद्र की स्थापना की। केंद्र की स्थापना के बाद से 591 वर्ष हो चुके हैं। इस मठ में वाचिक पूजा-आधार के तौर पर कग्यूर और तेनग्यूर के कई सेट उपलब्ध हैं। इसी प्रकार वाचिक पूजा-आधार हेतु आचार्य चोङखापा और प्रमुख दो शिष्यों के वचन-संग्रह, पनछेन गुरुओं के वचन-संग्रह, डछंग के पाठ्य ग्रन्थ हैं। शारीरिक पूजा-आधार के लिए शेरब सेंगे के अविभाज्य वस्तुएँ (डलपङ) हैं। प्रार्थना-कक्ष में बुद्ध की मूर्ति, आचार्य चोङखापा और शिष्यद्वय, तीन इष्ट देवों की मूर्तियाँ, बुद्धि से सृजित मण्डल, विशेषकर शेरब ग्यलछेन सेंगे की प्रतिमा आदि अनेक हैं। पचचित्र के तौर पर चोङखापा के 80 कारित्र, अवदान कल्पलता से सम्बद्ध पटचित्र आदि अनेक हैं। यहाँ अन्य विद्यापीठों से आये हुए गेशे आदि को खेन रिनपोछे अपनी प्राचीन परम्परा अनुसार तन्त्र का अध्यापन करते हैं। साथ ही आधुनिक शिक्षा पद्धति के अनुसार युवा भिक्षुओं को सामान्य विषयों और भाषाओं का अध्यापन किया जाता है। सूत्र और तन्त्र सभी विषयों को सिखने के लिए लगभग 15 वर्ष अध्ययन करना होता है। प्रत्येक वर्ष परीक्षा ली जाती है और अन्त में तन्त्र अध्ययन सम्पन्न होता है। इस डछंग में 400 आवासीय भिक्षु हैं जब कि गैर-आवासीय 1200 गेशे हैं। कुल मिलाकर 1700 भिक्षु हैं। यहाँ तिब्बती, हिमालीय लोग जैसे लद्दाखी, मोन-वासी, किन्नौरी, नेपाली आदि तथा मंगोलिया और भूटानी हैं।
Gyudmed Tantric University, P.O. Gurupura Hunsure Taluk, Mysore
Karnataka, 571 188

नमग्याल मठ फेनदे लेगशेद लिङ— तिब्बत के एक मात्रप्रभु आर्य अवलोकितेश्वर के भिक्षुवेष में अवतरित रूप परम पावन दलाई लामा के कर्म और प्रणिधान से सम्बद्ध है यह नमग्याल मठ फेनदे लेगशेद लिङ। इसकी स्थापना सर्वप्रथम द्वितीय दलाई लामा थमचेद खेनपा गेदुन ग्याछो ने ङ-दग-ग्याल इन तीनों में से छोसखोर ग्याल की स्थापना के साथ की। तत्पश्चात् तृतीय दलाई लामा थमचेद खेनपा सोनम ग्याछो ने सन् 1574 में पलदेन डेपुङ सङङग फोटङ की स्थापना की। इस अवसर पर उन्होंने गुरु चोङखापा के ग्रन्थ गुह्यसमाज की टीका का धर्म-प्रवचन किया और मठ का नाम फेनदे लेगशेद लिङ रखा। सन् 1478 में, मंगोल राजा अल्तान और दलाई लामा के बीच दानपति-गुरु का संबंध स्थापित हुआ। दोनों की लम्बी आयु के लिए उष्णीष विजया का अनुष्ठान किया गया। इसलिए नमग्याल (विजय) डछंग नाम से यह मठ विख्यात हुआ। बाद में इसे परम पावन का मठ भी कहा जाने लगा। सन् 1642 में पंचम दलाई लामा ङवाङ लोजङ ग्याछो ने गदेन फोटङ सरकार की स्थापना की और पोतला महल का विस्तार किया तथा इस मठ को 1653 में डेपुङ से पोतला स्थानांतरित किया गया। नमग्याल डछंग परम पावन तथा गदेन फोटङ के शासन तथा बौद्धधर्म के लिए अनेक पूजा-अनुष्ठान करता है। इसलिए डेपुङ सङङग फोटङ से चे (चोटी) पोतला में स्थानान्तरित होकर सङङग गछल का नव-निर्माण हुआ। अतः चे नमग्याल डशंग नाम से विख्यात हुआ। विशेष कर पंचम दलाई लामा के समय में यहाँ अधिकतर तान्त्रिक विधि स्थापित हुए और यह मठ पूर्व की तुलना में अधिक विकसित हुआ। सातवें दलाई लामा कलसङ ग्याछो ने इष्टदेव गुह्यसमजाज, चक्रसम्वर, भैरव— तीन मुख्य तन्त्रों का अभ्यास और अद्वितीय कालचक्र नृत्य, सूत्रण, सस्वर-पाठ आदि विधि स्थापित हुए। उस समय भिक्षुओं की संख्या 175 निर्धारित की, इसलिए भी "कालचक्र डछंग" नाम से जाना जाने लगा। 1751 में जब दलाई लामा ने राजनीतिक नेतृत्व संभाला और कशाग (कैबिनेट) की स्थापना की, तो मठ के भिक्षुओं को पोतला प्रशासन में विभिन्न उच्च और निम्न पदों पर भी नियुक्त किया गया। तब से, कई सदियों के लिए, उन्होंने दोनों दलाई लामा की धार्मिक जरूरतों और सरकार की अनुष्ठान आवश्यकताओं को कुशलतापूर्वक पूरा किया। निर्वासन में नमग्याल मठ फेनदे लेगशेद लिङ— तिब्बत में चीनी आक्रमण के बाद परम पावन 14वें दलाई लामा भारत आये। उन्होंने 1959-1960 के बीच आए हुए 52 नमग्याल डछंग के भिक्षुओं को विभिन्न स्थानों जैसे डलहौजी से इकट्ठा किया और 1962 में निर्वासन नमग्याल मठ की स्थापना की। उन्होंने पूर्व की भाँति नियम-आचरण, तोरमा-साधना पूजा, मण्डल-निर्माण, सस्वर-पाठ, तोरमा-निर्माण, घृत-अलंकरण, शंख-मुरली-वादन, नृत्य आदि का पुनरुद्धार किया। सन् 1970 में कई युवा तिब्बती छात्रों को भर्ती किया गया और वे बौद्ध दर्शन का अध्ययन करना शुरू कर सूत्र और तंत्र का अध्ययन करने की परंपरा स्थापित की। उसी समय महाशास्त्रों की देखरेख के लिए सर्वप्रथम खेनपो नियुक्त किया गया। अब तक सात खेनपो (मठ-अधिपति) हुए हैं। प्रथम खेनपो जेचुन लोजङ दोनडुब रहे। द्वितीय 100वें गदेन ठ्रिरिनपोछे जेचुन लोजङ ञिमा, तृतीय पूज्य देनमा लोछोस रिनपोछे, चतुर्थ गोवो जेचुन लोजङ तेनजिन, पञ्चम जादो टुलकु तेनजिन जुङने, षष्ठ जेचुन सोनम सङगे, सप्तम वर्तमान कार्यवाहक खेनपो ठ्रोमथोग रिनपोछे लोसङ दमछोस हैं। वर्तमान में लगभग 220 भिक्षु हैं। युवा भिक्षु 15 वर्षों तक प्रमुख दार्शनिक ग्रंथ, पांच प्रमुख अनुष्ठान ग्रंथ, तिब्बती भाषा, व्याकरण, इतिहास, काव्य और अंग्रेजी भाषा इत्यादि विविध विषयों का अध्ययन करते हैं। परम पावन दलाई लामा जी के दिशा-निर्देश अनुसार 2017 से युवा भिक्षु पारंपरिक अध्ययन के साथ-साथ विज्ञान, कंप्यूटर और अन्य आधुनिक विषय 10वीं कक्षा तक भी अध्ययन करते हैं।
Namgyal Monastery, Thekchen Choeling Road P.O. Mcleod Ganj, Dharamshala, Kangra
Himachal Pradesh, 176219

जैसे कि हिमालय जल का स्रोत है, उसी प्रकार मन्त्र-तन्त्र शासन का उत्स पलदेन सेद ग्युद डछंग रहा है। इसकी स्थापना सन् 1450 में हुई। फुरचोक ङवाङ जमपा द्वारा लिखित तीन महाविद्यापीठों और दो तन्त्र पीठों के इतिहास अनुसार इसका संस्थापक जेचुन शेरब सेङ्गे है। जबकि जमयङ शेदपा ङवाङ चोनडुस रचित भैरव इतिहास के अनुसार इस मठ का संस्थापक जेचुन शेरब सेङ्गे का शिष्य जे विनयधर पलदेन जङपो बताया गया है। परम पावन दलाई लामा के विचार अनुसार इसका संस्थापक जेचुन शेरब सेङगे पुष्ट होता है। भारत में स्थित पलदेन सेद ग्युद डछंग की स्थापना सन् 2000 में की गयी है। सेद ग्युद मठ का प्रमुख जमपा ङवाङ ने अनेक कठिनाइयों का सामना करते हुए इस मठ को स्थापित किया। परम पावन दलाई लामा जी की कृपा, आशीर्वाद तथा प्रणिधान से तथा मठ के भिक्षुगण, कर्मचारी गण तथा विशेषकर श्रद्धालु भक्तजनों की आर्थिक सहायता से यह मठ, परम-पावन निवास-कक्ष, पुस्तकालय, विद्यालय, रसोईघर, भिक्षु-आवास तथा चिकित्सालय का निर्माण हुआ है। मठ का सम्पूर्ण निर्माण होने से दिनांक 2 नवंबर, 2001 को परम पावन दलाई लामा ने इस मठ का उद्घाटन किया। उस दौरान परम पावन ने यहाँ पूर्व-योग धर्म-प्रवचन के लिये बोधिसत्त्व 37 आचरण, मध्यम भावनाक्रम, गदेन ल्हाग्यामा, गुह्यसमाज, चक्रसंवर व भैरव का एक साथ अभिषेक भी प्रदान दिया। साथ ही महाँकाल की अनुज्ञा, अक्षोभ्य का अभिषेक, श्वेत तारा आयु अभिषेक भी प्रदान किया। सम्प्रति यहाँ 101 भिक्षु हैं। यहाँ कक्षा 8 तक संचालन हो रहा है। पाठ्यक्रम में धर्माचरण पुस्तक का कण्ठस्थीकरण, मार्गक्रम, पूजा-पाठ का अध्यापन, तिब्बती भाषा, व्याकरण, काव्य, दर्शन, प्रमाणशास्त्र, अंग्रेजी तथा गणित का अध्यापन किया जाता है।
Sed-Gyued Dratsang, Ponda Godown, 10 1/2 Mile P.O. Topkhana, Kalimpong
West Bengal, 734301

लाटङ टशी खिल की स्थापना मूल रूप से 1709 में प्रथम जमयङ शेदपा ङवाङ चोनडुस ने दोमेद अन्तर्गत सङखोग टशी खिल में की। साथ ही उन्होंने थोईसम लिङ और ग्युदमेद डछंग— दो विद्यालय स्थापित कर उन्होंने शुरू में एक सभा भवन बनाया और दो महाविद्यालय स्थापित कर अध्ययन-अध्यापन प्रारम्भ किया। तत्पश्चात् उनके परम शिष्य ङवाङ टशी ने चिर काल तक इस विद्यापीठ को संभाला। कालान्तर में दूसरे जमयङ शेदपा ने प्रार्थना-भवन को 140 खंभों तक विस्तारित किया और कालचक्र और चिकित्सा महाविद्यालय स्थापित किया। चौथे जमयङ शेदपा ने हेवज्र विद्यालय की स्थापना की और चेनखङ छेनमो आदि का निर्माण किया। पाँचवें जमयङ शेदपा ने ग्युदतोद डछंग का नव-निर्माण किया। इस प्रकार जमयङ शेदपा उत्तराधिकारियों, गुङथङ तेनपी डोनमे आदि चार आसनारूढ व्यक्तियों, आठ खेनपो आदि अनेक लोगों ने इस विद्यापीठ को संभाला। निर्वासन में लाटङ टशी खिल— परम पावन दलाई लामा जी के दिशा-निर्देश अनुसार श्रीमान् गुङथङ छुलठ्रिम ने दायित्व ग्रहण कर सन् 1965 में सूत्र-तन्त्र का विद्यापीठ लाटङ टशी खिल का प्रतिनिधि मठ देहरादून भारत में स्थापित किया। सन् 1967 में परम पावन दलाई लामा जी ने इस मठ की प्राण-प्रतिष्ठा और उद्घाटन किया और साथ ही दिशा-निर्देश किया। मुख्य प्रार्थना-भवन में पूजा आधार के रूप में बुद्ध और अग्रश्रावकद्वय की मूर्तियाँ हैं। उनके दाये और बाये में गुरु चोङखापा और उनके दो प्रमुख शिष्य, आर्य मैत्रेय, आर्य अवलोकितेश्वर, भट्टारिका आर्या तारा, गुरु चोङखापा के हजार मूर्तियाँ, कुनखेन गुरु-शिष्य आदि हैं। इसके अतिरिक्त महाबोधि स्तूप और उनके दाये बाये में आठ स्तूप हैं। वर्तमान में मठ में 84 भिक्षु हैं। वे पांच प्रमुख बौद्ध दार्शनिक ग्रंथों का अध्ययन करते हैं। प्रारम्भिक स्तर के विद्यालयों में आठ कक्षा तक भाषा, तत्पश्चात् लोसल जुगङोग, यङसल नङजोद आदि का अध्यापन होता है। साथ ही कक्षा 8 तक अंग्रेजी, हिन्दी, गणित आदि सिखाया जाता है। यहाँ भिक्षुओं का नियम और आचरण सख्त है। बस्ती के लोग भिक्षुओं पर श्रद्धा रखते हैं तथा भिक्षु भी यहाँ विनय-पालन पूर्वक अध्ययन करते हैं।
Tashi Kyil Monastery, P.O. Clement Town, Dehradun
Uttarakhand, 248002

गदेन शरचे थोईसम नोरलिङ मठ— यह महाविद्यापीठ गदेन नमग्यल लिङ की एक शाखा है। गुरु चोङखापा के आठ साक्षात् शिष्यों के मध्य स्थविर रिनछेन ग्यलछेन ने इसकी स्थापना सन् 1424 में की। इस विद्यापीठ का प्रथम खेनपो गुरु चोङखापा के परम शिष्य खेडुब गेलेग पलजङ हुए। तब से आज कर 86 वें खेनपो अधिपति हुए हैं। इस विद्यापीठ से परम पावन के गुरु, परम पावन के सहपाठी मित्रगण, गदेन ठ्रिपा (पीठाधीश), छोसजे, परम्पराधारी खेनपो, लामा वुजेद आदि विद्वत्ता और सिद्धि से सम्पन्न अनेक महान् गुरु हुए। पहले तिब्बत में इस मठ में 2,500 से अधिक भिक्षु थे। सन् 1959 में चीनी आक्रमण के बाद, भारत में यह मठ स्थापित किया गया। प्रारम्भ में साक्या, गेलुग, कग्यूद, ञिङमा – सभी परंपराओं के लगभग 1,500 भिक्षु 10 वर्षों तक बक्सर थोईसम थरदोद लिङ नामक धर्म-अध्ययन केन्द्र में अध्ययन करते थे। परम पावन दलाई लामा जी के वृहत् योजना तथा तिब्बती सरकार के दिशा-निर्देश के अनुसार 1969 में भिक्षु दक्षिण भारत के विभिन्न बस्तियों में स्थानांतरित हुए। इसी के साथ यह विद्यापीठ मुंडगोड में स्थानान्तरित हुआ। भिक्षु मुख्य रूप से अध्ययन पर ध्यान केंद्रित थे। साथ ही जीविका के लिए केवल राहत की अपेक्षा न कर आत्म-निर्भर बनने के लिए भिक्षुओं ने दिन में खेती, व्यापार, उद्योग, कर्म-काण्ड अनुष्ठान, पशुपालन आदि कार्य करते हुए रात में वाद-विवाद और अध्ययन किया। बड़ी कठिनाइयों के साथ, दोनों शैक्षणिक और जीवन स्थितियों में सालाना सुधार हुआ। आज समस्त भिक्षुओं की जीविका विद्यापीठ ही प्रदान करता है और भिक्षु केवल अध्ययन-साधना के लिए संलग्न हैं। यहाँ कुल 11 डछंग (भिक्षु-निवास) हैं— दोखङ, फुखङ, ञगरे, ल्होपा, सुङछु, चोने, थेवो, तावोन, ङरी, सोगपा, गुङरु। मुख्य प्रार्थना-भवन (मठ) में पूजा-आधार के रूप में बुद्ध और दाये बाये अग्र श्रावक द्वय हैं। मुख्य प्रतिमा के दाये ओर आर्य मैत्रेय की प्रतिमा है तथा उसकी दाये-बाये ओर गुरु चोङखापा और आचार्य अतिश हैं। उसके दाये ओर आचार्य चोङखापा और उनके दो अग्र शिष्य की प्रतिमाएँ, तीन आयु देवों की प्रतिमाएँ हैं। मुख्य प्रतिमा के बाये ओर तीन कुल अधिपति देवों की प्रतिमाएं, आचार्य पद्मसम्भव, मेलारेपा, साक्या पण्डित कुनगा ग्यलछेन, श्रीवज्रभैरव देव गण की प्रतिमाएं विराजित हैं। सभी प्रतिमाएँ स्वर्ण-ताम्र निर्मित हैं। वाचिक पूजा-आधार के रूप में कग्यूर और तेनग्यर हैं। चित्त पूजा-आधार के रूप में महाबोधि स्तूप है। इस शिक्षा संस्थान में शिक्षण की अवधि— द्विवर्षीय प्रारंभिक अध्ययन, कक्षा 1 से 5 कक्षा तक पाँच वर्ष, तत्पश्चात् प्रमाणशास्त्र का प्रथम चरण डुसडा का अध्ययन हेतु चार वर्ष, प्रमाणवार्तिक एक वर्ष, प्रज्ञापारमिता अभिसमयालंकार पाँच वर्ष, मध्यमक ग्रन्थ तीन वर्ष, अभिधर्मकोश दो वर्ष, विनय दो वर्ष – कुल 17 वर्षों में महाशास्त्रों का अध्ययन कर विद्यापीठ में परीक्षा में प्रतिभागी होते हैं। उत्तीर्ण होकर मेधावी भिक्षु महापरीक्षा के लिए छह साल गहन अध्ययन कर उत्तीर्ण कर गेशे ल्हारमपा की उपाधि प्राप्त करते हैं। इसके अतिरिक्त विद्यापीठ में गेशे छोगरम, छोसठ्री, छोगसोग गेशे की उपाधियाँ भी प्रदान की जाती हैं। और भी जिन्होंने तन्त्र की परीक्षा शास्त्रार्थ में मत-मण्डन नहीं किया है, उन गेशे को ज्येष्ठता क्रम से प्रतिवर्ष महावर्षावास के समय वुमा शेदरिङ नामक तन्त्र सम्बन्धी मत-मण्डन करने का प्रावधान है। गेशे लोग मत-मण्डन करने के पश्चात् प्रायः ग्युद तोद और ग्युद मेद— इन दो मठों में तन्त्र का अध्ययन करने के लिए जाते हैं। गेशे उपाधि प्राप्त करने के बाद, अधिकांश शिक्षक के रूप में मठ में ही बने रहते हैं और सैकड़ों छात्रों को पढ़ाते हैं, अध्ययन और अभ्यास की परंपराओं को बनाए रखते हैं। कुछ एकांत में ध्यान करने में लग करते हैं, जबकि अन्य मठ या तिब्बती सरकार के लिए प्रशासनिक भूमिकाओं में सेवा करते हैं। कई तिब्बत, भारत, नेपाल, भूटान और अन्य देशों में बौद्ध धर्म पढ़ाने के लिए यात्रा करते हैं। इस मठ में नियमित रूप में आयोजित किये जाने वाले अनुष्ठान इस प्रकार हैं— • ग्रीष्म, वर्षा, शरत् और हेमन्त इन चार ऋतुओं होने वाले पर्वों में पूजा आयोजन। • तिब्बती वर्ष के प्रथम महीने के 22वें दिन से त्रयोदश भैरव सम्बन्धी धूलि-मण्डल की साधना-पूजा और होम चार दिन के लिए आयोजित किया जाता है। • प्रत्येक महीने अष्टमी तिथि में परम पावन दलाई लामा के लिए तथा तिब्बती धर्म और लोगों के लिए पूजा हेतु तारा-देवी पूजा, स्थविर स्तुति-वन्दन आदि। • तिब्बती 9वें महीने देवावतरण पर्व से जोडकर तीन दिवसीय पूजा। • बारहवें महीने में मैत्रेय की सहस्र-पूजा और वैशाली-प्रणिधान • प्रतिवर्ष कग्यूर का पाठ इत्यादि • उपोषध, वर्षावास, प्रवारणा— विनय के तीन वस्तुओं का पालन होता है। सन् 1972 में मठ का विद्यालय प्रारम्भ हुआ। क्रमश विकसित होकर आज 10 कक्षा तक 600 से अधिक छात्र हैं। यह विद्यालय भारत के माध्यमिक विद्यालय के तहत पंजीकृत है। शिक्षण पाठ्यक्रम में दर्शन व प्रमाण जैसे महाशास्त्रों, तिब्बती भाषा और साहित्य, अंग्रेजी, चीनी, सामाजिक विज्ञान, गणित और विज्ञान शामिल हैं। यहाँ त्रैमासिक, षाण्मासिक और वार्षिक परीक्षाएँ होती हैं। समुचित प्रशासन हेतु डछंग का प्रमुख खेन रिनपोछे, अनुशासन हेतु गेकोस और वुचेद— ये तीन हैं। इसी प्रकार गेशे छेनपो, कोषाध्यक्ष इत्यादि सैकड़ो कर्मचारी हैं।
Gaden Shartse Monastery University, P.O. Tibetan Colony, Mundgod, Karwar
Karnataka, 581411

जङछुब छोसलिङ— यह भिक्षुणी मठ है। यह मठ दक्षिण भारत कर्णाटक प्रदेश में मुंडगोड स्थित दोदगु लिङ तिब्बत बस्ती-3 में अवस्थित है। 1984 में परम पावन दलाई लामा जी ने इस बस्ती का दौरा किया, तब परम पावन जी के मार्गदर्शन के अनुसार यह मठ निर्मित हुआ। इसका निर्माण 1 जुलाई, 1987 को (धर्म चक्र प्रवर्तन दिवस के उपलक्ष्य पर) सम्पन्न हुआ तथा परम पावन दलाई लामा जी की गरिमागयी उपस्थिति में इस मठ की प्रतिष्ठा एवं अनावरण हुआ। परम पावन दलाई लामा जी ने इस मठ का नाम जङछुब छोसलिङ रखा और साथ ही 19 छात्राओं का चूडा-कर्तन करने की कृपा की। सन् 2003 में परम पावन दलाई लामा जी से परामर्श व अनुमति प्राप्त कर पुराने भवन के स्थान पर नया प्रार्थना-भवन का निर्माण किया गया। जब चार मंजिला प्रार्थना-कक्ष (मठ) का निर्माण सम्पन्न हुआ तब सन् 2007 में परम पावन दलाई लामा ने इसका उद्घाटन किया और साथ ही मार्गदर्शन किया। इस मठ में मुख्य वाचिक पूजा-आधार बुद्ध की मूर्ति, 21 आर्या आर्या तारा देवियों की मूर्तियाँ, आर्य अवलोकितेश्वर, आचार्य चोङखापा, पलदेन ल्हामो आदि है। वाचिक पूजा आधार हेतु कग्यूर और तेनग्यूर आदि ग्रन्थ रखे गये हैं।
Jangchub Choeling Nunnery, , Camp No.3 P.O. Tibetan Colony Mundgod, Distt. Karwar
Karnataka, 581411