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धर्म एवं संस्कृति विभाग
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    से-खांग युंगडुंग ल्हात्से

    से-खांग युंगडुंग ल्हात्से

    MONASTERY

    सन् 1994 में लद्दाख में रहने वाले बोन अनुयायियों ने बड़े बुजुर्गों के मार्गदर्शन के अनुसार में एक एक सामुदायिक घर बनाया और अपने धर्म-संस्कृति के संरक्षण के लिए हर महीने की अष्टमी, दशमी, पूर्णिमा व अमावस्या के दिन पूजा-पाठ आदि की प्रथा शुरू की। इसका प्रारूप प्रारम्भ में एक सामुदायिक घर था, कोई मठ का नाम नहीं था। तब सन् 2002 में ख्यूङ-रिग गेशे लुंगरिग निमा ने इस मठ का नव-निर्माण किया। 2017 में उन्हें लद्दाख स्थित शेन-तेन युंगडुंग ल्हात्से के मठ-अधिपति के रूप में नियुक्त किया गया। इस मठ में काय-आधार के रूप में औषध-मृत्तिका से निर्मित शेनरब मिवो का सम्भोग-काय, , ताम्र-निर्मित चार सुगतों की प्रतिमाएं, स्वर्ण-ताम्र निर्मित सम्भोग-कायिक बुद्ध की प्रतिमा, स्वर्ण-ताम्र निर्मित बोन-शास्ता और शिष्यद्वय, यिदम तक्ला, ख्रोवो चोछोक, और महामाता शेरब जम्मा की प्रतिमा आदि हैं। वाणी-आधार के रूप में युंगडुंग बोन के एक पोथी-सेट धर्म-प्रवचन ग्रन्थ, एक पुस्तक-सेट धर्म-प्रवचन ग्रन्थ है। का-तेन में भी तन्त्र, महासन्धि (जोगछेन), अनुष्ठान आदि अनेक प्रकार हैं। चित्त-आधार के रूप में ताम्रनिर्मित युंगडुंग कोदलेग स्तूप, ताम्र निर्मित और रजत-लिप्त ३ युंगडुंग कोदलेग स्तूप विराजमान हैं। यहां, दो भिक्षु, पांच मन्त्र साधक (योगी), और दो मन्त्र-साधिकाएँ (योगिनियाँ) हैं। यहाँ नियमित रूप से बोन-शासन रक्षक सिदपी ग्याल्मो का पूजा-पाठ, प्रज्ञापारमिता का पाट, दुटिसु पाप-सुद्धि विधि का पाठ होता है। जब भी निर्वासित तिब्बती सरकार से तिब्बती धर्म और राजनीति के लिए अनुष्ठान करने के लिए निर्देश प्राप्त होता है, तब निर्देश का पालन किया जाता है। विद्यालय के अवकाश व शीतकालीन अवकाश के समय युवा-पीढियों को धर्म-संस्कृति का अध्यापन किया जाता है। यहाँ युंगडुंग बोन के इतिहास के जिज्ञासु आते हैं, उन्हें भी यहाँ पढाया जाता है।

    Yungdrung Lhatse, Bon Culture Center, Camp 1, Near Zampa,, P.O, Choglamsar, Leh,

    , 194101

    पाल शेन्तेन मेनरी लिङ मठ

    पाल शेन्तेन मेनरी लिङ मठ

    MONASTERY

    द्वितीय बुद्ध ञममेद शेरब ग्यालछेन (1356-1415) ने 1405 में तिब्बत के वुचङ शिगाचे (वर्तमान नमलिङ जोङ) में स्थित चङ-थोब-ग्याल पर्वत की ढलान पर पाल शेन्तेन मेनरी लिङ मठ को स्थापित किया था। यह तिब्बत में सबसे महत्वपूर्ण बोन मठ है। बोन समुदाय के सभी विद्वानों और बोन-अनुयायियों के लिए बोन-धर्म के अभिषेक, आगम, उपदेश ग्रहण करने तथा विशेषकर विशुद्ध शील पालन करने वाले बोन गुरुओं के लिये यह उच्चतम केन्द्र रहा है। इस मठ में आज तक अतुल्य गुरु शेरब ग्यालछेन से लेकर महान् गुरु लुङतोक दावा दरगे पर्यन्त 34 मेनरी मठाधीश हुए हैं। 33वें मेनरगी मठाधीश लुङतोग तेनपी ञिमा पलजङपो (1929-2017) ने 1970 में हिमाचल, भारत में अवस्थित नए बोन बस्ती में महामठ (विद्याकेन्द्र) पाल शेन्तेन मेनरी लिङ की स्थापना की। मंदिर के मुख्य पूज्य आश्रय के रूप में मृत्तिका-निर्मित एक मंजिला बोन-शास्ता शेनरब मेवो संभोगकाय वेश की प्रतिमा तथा अतुल्य गुरुवर जे-ञम-मेद शेरब ग्याल्छेन की प्रमिता, ताम्र व सुवर्ण लिप्त शरण्यनाथ दावा ग्यालत्सेन की प्रतिमा, 32वें मेनरी पीठाधीश शेरब लोडोस का अस्थि-अवशेष स्तूप, मूल गुरु युङ-डुंग लिङ के महोपाध्याय शेरब तेनपी ग्यालछेन का अस्थि-स्तूप, महान् गुरु सङगे तेन्ज़िन का अस्थि स्तूप प्रतिष्ठापित हैं। उसी प्रकार इसमें बोन-शास्ता के प्रवचन-ग्रन्थ तथा उन पर आधारित शास्त्र स्थापित हैं। इस प्रकार यह मठ आंतरिक और बाह्य रचना-व्यूह से सम्पन्न है। 1978 में रिनपोछे ने बोन साधना व अध्ययन का केन्द्र स्थापित कर बोन के अद्वितीय सूत्रों व तन्त्रों तथा सामान्य तिब्बती विद्यास्थानों का अध्ययन-अध्यापन की सुविधा समस्त विद्याथियों को प्रदान की। इन समस्त विद्याओं में पारङ्गत लोगों को गेशे की उपाधि प्रदान करने की व्यवस्था बनायी। तब से आज तक इन मेनरी मठ से 165 गेशे उपाधि धारक हुए हैं। 1988 और 2007 में परम पावन दलाई लामा ने मेनरी मठ तथा विद्याकेन्द्र का दो बार भ्रमण किया और साथ ही अध्ययन-सम्पन्न स्नातकोत्तरों को उपाधि प्रदान करने के लिए सहमति व्यक्त की। अध्ययन और साधना करने वाले हर महीने में प्राचीन मेनरी आचार्यों की साधना का पालन करते हुए प्रथम तिब्बती-मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी से लेकर अमावस्या पर्यन्त प्रज्ञा अधिष्ठाता शेरब म्रवी सेङ्गे (प्रज्ञावादी सिंह) की साधना करते हैं औऱ बारहवें तिब्बती माह क्रोधी और कील के गु-तोर महापूजा का अनुष्ठान करते हैं। मेन्री के 33वें पीठाधीश द्वारा मठ की स्थापना के पश्चात् क्रमशः अनेक भवन निर्मित होने लगे। जैसे गुरुओं के लिए आवास, बोन धर्मपालक देवी-देवताओं का साधनाकेन्द्र मेनरी डुब वङ शाला, समस्त धार्मिक ग्रन्थों का संग्रह हेतु युंगडुंग बोन पुस्तकालय, मेन्री और युंगडुंग लिङ के विद्वानों की प्रतिमाओं और खर-ना ग्यालछब के उत्तराधिकारियों के प्रतिमाओं को स्थापित करने के लिए कुदुङ खङ (प्रतिमा-घऱ) निर्मित हैं। इसी प्रकार तिब्बत की अद्वितीय चिकित्सा परंपरा को पुनर्जीवित करने और संरक्षित करने के लिए, 2014 में एक चिकित्सा प्रणाली का अध्ययन करने के लिए एक कॉलेज की स्थापना की गई। विभिन्न देशों से लोगों के साथ संपर्क और समन्वय संस्थापित करने के लिए तथा मठ के आन्तरिक व बाह्य कार्यों का निरीक्षण करने के लिए प्रशासन, बोन बाल-बालिकाओं के अध्ययन हेतु बोन बाल-केन्द्र आदि स्थापित है। और भी युंगडुंग बोन की भिक्षुणियों के लिए भिक्षुणी मट रत्न मेन्लिंग तथा गृहस्थ व प्रवज्रित सभी के लिए साधना हेतु तान्त्रिक साधना द्वीप की स्थापना की गई है। 2018 में शरण्य लुंगतोक दावा दरग्ये को श्वेत-मुकुट धारी युंगडुंग बोन के 34वें पीठाधीश रूप में नियुक्त किया गया । शरण्य लुंगतोक दावा दरग्ये ने अपने पूर्ववर्ती मूल गुरु शऱण्य लुंगतोक तेन्पी निमा पल्संगपो की प्रतिमा, स्वर्ण-लिप्त पार्थिव प्रतिमा, अस्थि-अवशेष स्तूप, शरण्य ३३वें मेनरी पीठाधीश आदि की प्रतिमायें स्थापित की गयी हैं। 2020 मे मेनरी जोगछेन साधना केन्द्र का नवीनीकरण किया गया। तब से हर सुबह और शाम को धूपदान, तोरमा-दान, आदि दानचतुष्टय से पूजा के साथ साधना के पूर्वगामी नव-लक्ष से पुण्यार्चन औऱ विशुद्धि का अनुष्ठान, नाडी-वायु का अभ्यास शतपाश, ४९ दिवसीय मुन-छम (अन्धकार साधना), रसायन का अनुष्ठान किया जाता है। इस प्रकार साधना अध्ययन रत छात्रों का दीक्षान्त (साधना और अध्ययन) पूर्ण हो गया। इसके अतिरिक्त चार मंजीले भवन प्रारम्भिक छात्रों के लिए निर्मित है। यहाँ आज 40 प्रारम्भिक छात्र तिब्बती भाषा, व्याकरण, दान-चतुष्टय अनुष्ठान, अंग्रेजी भाषा का लेखन-पठन, पूजा-पाठ विधि का अध्ययन करते हैं। पाल शेन्तेन मेनरी लिङ मठ में तिब्बती, नेगी, सिक्किमी और नेपाली आदि प्रायः 282 भिक्षु अध्ययन और साधना में लगे रहे हैं।

    Menri Monastery, PO, Dolanji, Kotla Panjola, Via Oachghat, Distt. Sirmour

    Himachal Pradesh, 173223

    सोग युंगडुंगलिङ

    सोग युंगडुंगलिङ

    MONASTERY

    सोग युंगडुंगलिङ बोनपो मठ की स्थापना खेनपो योनतेन ग्यात्सो रिम्पोछे ने 25 अप्रैल, 2013 को सिक्किम के यांगंग क्षेत्र में की। इस मठ का निर्माण मुख्य रूप से प्राचीन तिब्बती धर्म और संस्कृति का संरक्षण व उद्धार करने के लिए तथा विशेष रूप से हिमालय के गरीब छात्रों को प्राचीन और आधुनिक शिक्षा र प्रदान करने के उद्देश्य से किया गया है। इस मठ में काय पूजा-आधार प्रतिमा के रूप में बोन-शास्ता शेनरब मिवो की प्रतिमा है, वाणी पूजा-आधार के रूप में बोन-धर्म प्रवचन और शास्त्र हैं, और चित्त पूजा-आधार के रूप में युंगडुंग कोदलेक स्तूप है। सभी छात्र-छात्राएँ विद्यालय में आधुनिक विषयों का अध्ययन और मठ में आध्यात्मिक शास्त्रों का अध्ययन करने हैं। वर्तमान में यहाँ 44 भिक्षु और 29 भिक्षुणियाँ हैं, कुल मिलाकर छात्र-छात्राओं की संख्या 73 हैं। उनमें से आठ भिक्षु नेपाल के ठ्रितेन नोरबु-चे में दर्शनशास्त्र का अध्ययन कर रहे हैं। दो छात्र धर्मशाला में थंका पेंटिंग का प्रशिक्षण ले रहे हैं। एक छात्र चिकित्सा-शास्त्र का अध्ययन कर रहा है, और दो छात्र वाराणसीस्थ केन्द्रीय उच्च तिब्बती शिक्षा संस्थान में अध्ययन-रत हैं। एक छात्रा सिक्किम में एक निजी कॉलेज में अध्ययन कर रही है।

    Sog Yungdrung Ling Bon Monastery, Yangang South Sikkim near Sikkim University, Ravangla

    Sikkim, 737139

    ज़ा मोनग्याल युंगडुंग लिंग

    ज़ा मोनग्याल युंगडुंग लिंग

    MONASTERY

    लिङ-छंग छोग्याल के शासनकाल में विभिन्न धार्मिक संप्रदायों के लगभग 30 मठ थे। ज़ा मोनग्याल युंगडुंग लिङ जा, गो ज़ोंग - तीन और छे, तेन, मोन – तीन के रूप में सुविदित छः लोकप्रिय मठों में से एक था। 18वीं शताब्दी में रिग्ज़िन कुनडोल जाछोन ञिङ्पो ने इस मठ की स्थापना की। तत्पश्चात् उनके अनेक उत्तराधिकारी हुए। विशेष रूप से 6वें उत्तराधिकारी हूँछेन डोदुल लिङपा तिब्बत की परतन्त्रता से पूर्व लिङछंग के राजा और मंत्रियों के राज-गुरु के रूप में सम्मानित हुए। तिब्बत की पराधीनता के पश्चात् अपने अनुचर सहित राजा का भारत में आगमन हुआ। सन् 1972 में, देहरादून स्थित मण्डुवाला, उत्तराखण्ड प्रदेश में खाम लिङ छंग बस्ती की स्थापना की गई । तिब्बती धर्म-संस्कृति के संरक्षण और विशेष रूप से ज़ा मंग्याल मठ के धर्म-परम्परा के संरक्षण के लिए लिङ छंग धर्मराज ने 29 सितंबर, 1974 को गुरु हूँछेन के प्रत्यक्ष शिष्य मोनग्याल मठ के गुरु ठ्रिनले ग्यात्सो को ज़ा मोनग्याल मठ के लिए भूमि प्रदान की। गुरु ठ्रिनले ने सन् 1975 में सभी प्रकार की कठिनाइयों का सामना करते हुए अपने तन मन धन से कुंडोल नामखा ट्रिनले वंग्याल रिन्पोछे के लिए निवास और भिक्षुओं के आवास का निर्माण किया। सन् 1995 में लिङछङ के मुखिया और कुछ बस्ती के कुछ बुजुर्गों ने 33वें मेनरी मठाधीश से लिङछङ निवासियों का यह अनुरोध व्यक्त किया कि उन्हें जा मोनग्याल मठ में पूज्य आधार गुरुओं और भिक्षुणों की स्थिति अनिवार्यतः होनी चाहिए। अतः मठाधीश ने लोगों के बोन-धर्म और बोन-अनुयायियों के हित को ध्यान में रखकर उपाध्याय गेशे निमा डगपा रिन्पोछे को लिङ बस्ती के मोनग्याल मठ की स्थापना की जिम्मेदारी सौपी। उन्होंने तदनुसार मेनपी मठ से शरण्य मेनरी के महागुरु योङतोन ठ्रिनले निमा रिन्पोछे तथा कुछ अन्य गुरुओं को आमंत्रित किया गया। 12 मई, 1996 को मेनरी के महागुरु योङतोन ठ्रिनले निमा रिन्पोछे और कुनडोल नामखा ठ्रिनले वंग्याल रिन्पोछे की उपस्थिति में शरण्य कुनडोल नामखा ठ्रिनले वंग्याल रिन्पोछे जी के समान धातु और वर्ष वाले साक्या रबतेन मठ के अवतारी गुरु ङवाङ तेनपी ग्यालछेन रिन्पोछे ने शुभ लक्षण सहित शिला न्यास हेतु भूमि-खनन कर प्रारम्भ किया। लिङ बस्ती के सम्बन्धित कर्मचारियों और ओगेन ग्यूर्मे जैसे लोगों ने मठ के निर्माण के संबंधित सभी कार्य अच्छी तरह से कर मठ के आंतरिक और बाहरी संरचना पूरी की। तत्पश्चात् मठ की प्राण-प्रतिष्ठा व उद्घाटन के लिए शरण्य मेनरी पीठाधीश रिन्पोछे को आमन्त्रित किया गया। उन्होंने सहर्ष आमन्त्रण स्वीकार किया और 9 अक्टूबर, 2000 को शरण्य मेनरी पीठाधीश रिन्पोछे की अध्यक्षता में मठ की प्राण-प्रतिष्ठा हुई। विशेष कर शरण्य मेनरी पीठाधीश रिन्पोछे ने लिङ छंग बस्ती के लोगों को आयु-अभिषेक और धर्मप्रवचन दिया। अपनी बात में शरण्य मेनरी पीठाधीश रिन्पोछे ने बस्ती के लोगों का अनुमोदन किया और लिङ-छंग के वंश और परम्परा को वाहक के रूप में रिन्पोछे ने भी बस्ती-वालों की भूरि-भूरि प्रशंसा की। साथ ही रिन्पोछे ने लोगों से यह अनुरोध किया कि भविष्य में निरन्तर शुभ कार्य करे और प्रगति करे। बस्ती के मुखिया और बुजुर्गों ने रिन्पोछे के प्रति आभार व्यक्त किया। तब से परंपरा के अनुसार यहाँ बोन-शास्ता शेनराब मेबो रिन्पोछे की जन्म-जयन्ती में विधिपूर्वक अनुष्ठान किया जा रहा है। मठ के मुख्य पूजा-आधार के रूप में बोन-शास्ता शेनरब मेवो छे की प्रतिमा, शेनल्हा होदकर, सिदपा सङपो वुमठ्री, शास्ता शेनरब के धर्म-प्रवचन ग्रन्थ, धर्म-प्रवचन ग्रन्थ पर आधारित शास्त्र-संग्रह स्थापित हैं। और भी साधना-कक्ष में शरण्य ३३वें मेनरी पीठाधीश रिन्पोछे से प्राप्त सुवर्णमय शास्ता सम्भोगकाय, और भी ग्यालवा दुसपा, समन्त-भद्र, यिदम सेखर छोगङा, यिदम तकल्हा मेबर, शासन-रक्षक प्रमुख सिदमा ग्यालपो आदि की प्रतिमाएँ विराजमान हैं।

    Za Mongyal Yungdrung Ling P.O, Manduwala, , Distt. Dehradun

    , 248001

    युंगडुंग कुनड्रक लिङ

    युंगडुंग कुनड्रक लिङ

    MONASTERY

    शू-री शिंग युंगडुंग कुनड्रक लिङ की स्थापना पहली बार तिब्बत में शू-ये नामग्याल तेन्पा की थी। भारत में लामा युंगडुंग छुलठ्रिम ने 1984 में सिक्किम के रावणला स्थित कुन्फेन लिङ में तिब्बती धर्म के शिक्षण को पुनर्जीवित करने और बढ़ावा देने के उद्देश्य से इस मठ की स्थापना की। वर्तमान में इस मठ का प्रमुख खेनपो गेशे निमा सांगे हैं। यहाँ तिब्बती, मोनपा, नेवारी, शेर्पा, तामाङ और गुरूङ समुदायों से लगभग 13 भिक्षु हैं।

    Yungdrung Kundakling, , Bakhim Busty, P.O, kewzing Bazar, Via Ravangla,

    ,

    टशी गेग्ये थातेन लिङ.

    टशी गेग्ये थातेन लिङ.

    MONASTERY

    1959 में जब चीन ने तिब्बत पर आक्रमण किया तब पालडेन ताशी मेनरी मठ के 32वें शेरब लोदो रिन्पोछे, रब्ग्ये युंगडुंग लिङ के महोपाध्याय शेरब तेन्पाई ग्यात्सेन रिन्पोछे, शरण्य गुरुप्रवर योङजिन पोन्लोब सांग्ये तेन्ज़िन रिन्पोछे, मेनरी योन्जिन पोन्लोब तेन्ज़िन नामडक रिन्पोछे, और कई अन्य बोन लामा और प्रतिष्ठित विद्वानों को भारत और नेपाल में शरण लेनी पड़ी। 32वें मेनरी पीठाधीश शेरब लोदो रिन्पोछे ने बोन-धर्म को संरक्षण प्रवर्धन करने के लिए स्विट्जरलैंड के अंतर्राष्ट्रीय रेड क्रॉस सोसाइटी से सहायता प्राप्त की और 1960 में नेपाल में डोल्पो नोरजिन-लिङ बस्ती के साथ-साथ इस मठ की स्थापना की। मठ-स्थापना का मुख्य दायित्व मेनरी के महोपाध्याय शेरब लोदो ने संभाला। इसलिए भविष्य के बोन इतिहास में इनका योगदान महत्वपूर्ण बना है। उसके बाद, खुंग ब्ला छुलठ्रिम निमा ने मठ और बस्ती दोनों का दायित्व निर्वहन करते हुए इस बस्ती में विद्यालय की स्थापना की। विशेष रूप से उन्होंने गरीब और जरूरतमंद लोगों की मदद की, और अनाथों और कमजोर बच्चों को भोजन और कपड़े प्रदान किए। उनके देहावसान के बाद खेनपो सोनम ग्यालछेन ने इस मठ की देखभाल की। फिर, मई 1996 में गेशे तेन्ज़िन धार्ग्ये जी टशी गेग्ये थातेन लिङ. के उपाध्याय के रूप में नियुक्त हुए। तब उन्होंने मठ के आंतरिक और बाहरी मामलों का पूर्ण दायित्व ग्रहण किया। देश व विदेश के दाताओं की सहायता से 1998 में उन्होंने मठ का नवीनीकरण, नवीन सभागृह आदि का निर्माण कर बोन-धर्म और लोगों का व्यापक हित किया। सन् 1987 में जब वैद्य छुलठ्रिम सांग्ये यहाँ आये, तब से यहाँ बोन चिकित्सा शास्त्र बुम-शी (चार तन्त्र) का अध्ययन-केन्द्र स्थापित हुआ। इससे स्थानीय लोगों और अपने समुदाय का बड़ा कल्याण हो रहा है। वर्तमान में इस मठ में खेनपो तेन्ज़िन धार्ग्ये और कुछ ह भिक्षु हैं। किन्तु यहाँ तान्त्रिक वर्गों के द्वारा नियमित रूप से प्रातः धूपन और सन्ध्या प्रार्थना का पाठ, मुख्य दिसों में पूजा आदि निरन्तर होती रही है। यहाँ गर्मियों के दिनों में बोन चिकित्सा शास्त्र बुमशी के अध्यापक छुलठ्रिम सांग्ये और अध्यापक और छात्र रहते हैं।

    Tashi Gey Gye Thatenling, Bon Monastery, Dhorpatan, P.O, Buwang Ga. Be. Sa. , Distt. Baglung,

    ,

    पलदेन ठितेन नोरबु चे

    पलदेन ठितेन नोरबु चे

    MONASTERY

    युंगडुंग बोन के महान मठ पलदेन ठितेन नोरबु चे की स्थापना 14वीं शताब्दी में मुशेन निमा ग्यालत्सेन ने तिब्बत के चांग क्षेत्र में स्थित शेन मठ के केंद्र का विस्तार करने के हिस्से के रूप में दर्धिग रीयल पर्वत पर की थी। यह मठ बोन-शास्ता शेनरब के उत्तराधिकारियों के लिए विमुक्ति का महान् केंद्र है। इस केंद्र से कई महान आचार्य हुए और उन लोगों ने व्याख्यान, वाद-विवाद और रचनाओं, और श्रवण, चिंतन और मनन के द्वारा युंगडुंग बोन-धर्म का सभी दिशाओं में प्रचार कर महान् योगदान दिया। निर्वासन में बोन-धर्म का अध्ययन, वाद-विवाद, लेखन, प्रवचन, साधना और भावना करने के लिए केन्द्र स्थापित करें – इस प्रकार मुस्ताङ आदि जिले के बोन-अनुयायियों के अनुरोध पर सन् 1987 में मेनरी मठ के आचार्य तेनजिन नमदग रिन्पोछे जी ने स्वयम्भू, काठमण्डू में यह मठ स्थापित किया। बाद में, मारोन गेशे लोबसांग वंग्याल ने इन मठ में मठाधीश का दायित्व ग्रहण स्वीकार किया। शरण्य गुरुवर योन्जिन रिम्पोछे की कृपा और और विश्व भर के श्रद्धालु दानपतियों की आर्थिक सहायता से आधार मठ और आधेय प्रतिमा आदि सहित अध्ययन-केन्द्र, साधना-केन्द्र, विशेष प्रशिक्षण कक्षा, प्रारम्भिक पाठशाला, प्राचीन चिकित्सा परम्परा चतुष्टयतन्त्र विद्यालय स्थापित हैं। इसके साथ यहाँ युंगडुंग बोन से सम्बन्धित सूत्रवर्ग, तन्त्रवर्ग, चित्तवर्ग सहित विशिष्ट विद्याओं का तथा पाच विद्यास्थानों का श्रवण, चिन्तन, भावना, अध्ययन, अध्यापन, लेखन से तथा अध्ययन-अध्यापन और साधना का बोन-धर्म का संरक्षण किया जाता है। इस अध्ययन सम्पन्न कर गेशे उपाधि-धारक और महासन्धि (जोग-छेन) की साधना कर बोन के साधक योगी प्रतिवर्ष निकल रहे हैं। आज तब गेशे और साधना सम्पूर्ण योगियों की संख्या प्रायः २०० है। आज यहाँ शरण्य महोपाध्याय तेनपा युंगडुंग रिन्पोछे, आचार्य छङपा तेन्जिन रिन्पोछे, साधना-केंद्र के आचार्य छुलठ्रिम तेन्जिन रिन्पोछे, शिक्षण-साधना के अधिपति, शिक्षण-साधना के आचार्य, और मूल आचार्य के संरक्षकत्व में यहाँ तिब्बत और हिमालयी क्षेत्रों के भिक्षु हैं, जिनकी संख्या २२४ है। सामान्य रूप से, युंगडुंग बोन में असंख्येय अनुष्ठान हैं। प्रमुखतया, शेन, ब्रु, शु, पा, मियु आदि हैं और मूल सिद्धान्त में कोई भेद नहीं। किन्तु पाठ-संगायन, स्वर, नृत्य, वेणु-वादन, वाद्य-वादन की क्षुद्र भिन्नताएँ हैं। यहाँ अधिकतक ब्रु- परम्परा के अनुसार बोध तान्त्रिक अनुष्ठान होता है और बोन के शास्त्रों का श्रवण, चिन्तन, भावना और साधना होती है।

    Triten Norbutse Monastery Ichangu - 6, Teen Eihare, GPO Box No. 4640, Kathmandu

    , 4640

    रत्न मेनलिंग भिक्षुणी-मठ

    रत्न मेनलिंग भिक्षुणी-मठ

    NUNNERY

    रत्न मेनलिंग भिक्षुणी-मठ की स्थानपना शरण्य 33वें मेनरी पीठाधीश लुंगतोग तेन्पाई निमा रिम्पोछे ने सन् 2001 में थोपग्याल बोन नई बस्ती में की। क्रमशः पूजा-कक्ष, पूज्य-आधार के रूप में महामाता शेरब जम्पा की एक मंजिला मृत्तिका-प्रतिमा, जिन-बुद्ध शेनरब के प्रवचन-रत्न, बोन आचार्यों द्वारा रचित ग्रन्थ रत्न स्थापित हैं। इसके अलावा, भिक्षुणियों के लिए साधना-केंद्र, भिक्षुणी-आवास, रसोईघर, अतिथि-गृह, औषधालय, पुस्तकालय और कार्यालय भी स्थापित हैं। 2010 में, युंगडुंग बोन की भिक्षुणियों के लिए ग्रन्थ-अध्ययन और साधना करने की व्यवस्था बनाये जाने के पश्चात् युंगडुंग बोन के विशिष्ट ग्रन्थ सूत्रवर्ग, तन्त्रवर्ग और चित्तवर्ग का अध्ययन के साथ समस्त सामान्य तिब्बती विद्यास्थानों का अध्ययन सम्पूर्ण करने वाली भिक्षुणियों को गेशे-उपाधि प्रदान करने की व्यवस्था की गयी। तदनुसार सन् 2022 और 2023 में ऐसे तिब्बती विद्यास्थानों में अध्ययन सम्पूर्ण किये गये भिक्षुणियों को शरण्य 34वें मेनरी पीठाधीश लुंगतोक दावा धार्ग्ये ने गेशेमा की उपाधि प्रदान की है। अब तक 9 भिक्षुणियों ने गेशेमा की उपाधि प्राप्त की है। यहाँ ग्यालवा मेनरी की परंपरा के अनुसार साधना-विधि का अनुष्ठान और होता है। आज यहाँ तिब्बती, किन्नौरी और नेपाली आदि 80 भिक्षुणियाँ अध्ययन और साधना में संलग्न हैं।

    Ratna Menling c/oPal Shenten Menri Ling Yungdrung Bon Monastic Center,, Dolanji, Solan,

    , 173223

    शेन (बोन-शास्ता) का गुह्यमन्त्र भावना-साधना द्वीप

    शेन (बोन-शास्ता) का गुह्यमन्त्र भावना-साधना द्वीप

    MONASTERY

    सन् 1959 में हुए तिब्बत देश के संकट से समस्त धर्म बड़े खतरे में प़ड गये। इसलिए गुरुजनों को अन्य देशों का शरण लेना पड़ा। तत्पश्चात् 1970 में श्वेत-मुकुट धारी बोन धर्म के विभूति, 33वें पीठाधीश शऱण्य लुंगतोक तेन्पी ञिमा पल्संगपो ने मेनरी लिङ मठ की स्थापना की । बाद में, 2005 में, 33 वें पीठाधीश शरण्यनाथ ग्यालवा मेनरी ने नए बोन बस्ती के पीछे और पाल शेनतेन मेनरी लिङ के उत्तर में इस गुह्य मन्त्र केंद्र का निर्माण शुरू किया। तब से, कई वर्षों तक गर्मियों की बारिश के कारण निर्माण में बाधाएं आईं। रिन्पोछे स्वयं ने छह वर्ष तक व्यूह रचना आदि का कार्य कर इस साधना केन्द्र का निर्माण किया। वर्ष 2011 में, निर्माण पूरा हुआ और 5 नवंबर को इस साधना केन्द्र का प्रतिष्ठान किया गया। आज इस केंद्र में 18 पुरुष मन्त्र साधक और 9 महिला मन्त्र साधक हैं। इस प्रकार, आज कुल सदस्यों की संख्या 27 है। केंद्र का नाम शरण्य पीठाधीश ने शेनलू गोम्ड्रुप लिङ रखा था, लेकिन बाद में इस नाम में थोड़ा बदलाव कर इसका नाम साङग गोम्ड्रुप लिङ रखा गया।

    c/oPal Shenten Menri Ling , Dolanji, Solan,

    , 173223